महाराणा उदयसिंह का इतिहास: पन्ना धाय ने जिसे बचाया, उसने बसाया उदयपुर | Maharana Udai Singh History in Hindi

Maharana Udai Singh II and the historic landscape of Udaipur, founder of Udaipur city.

एक धाय मां ने अपने बेटे को राजकुमार के बिस्तर पर सुला दिया, ताकि असली राजकुमार बच सके। वही बचा हुआ बालक आगे चलकर मेवाड़ का शासक बना और उसने उदयपुर शहर बसाया। महाराणा उदयसिंह का इतिहास यही है: राणा सांगा के बेटे, महाराणा प्रताप के पिता, 1540 से 1572 तक मेवाड़ के शासक और 1559 में उदयपुर व उदयसागर झील की नींव रखने वाले। चित्तौड़ का तीसरा साका भी इन्हीं के शासनकाल में हुआ।

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नाममहाराणा उदयसिंह (उदयसिंह द्वितीय)
जन्म4 अगस्त 1522, चित्तौड़गढ़
पिता / माताराणा सांगा (संग्रामसिंह) / रानी कर्णावती
वंशसिसोदिया, मेवाड़
राज्याभिषेककुंभलगढ़ में (वर्ष पर मतभेद: 1537 से 1540), चित्तौड़ पर अधिकार 1540
शासनकाल1540-1572 (ज़्यादातर स्रोतों के अनुसार)
प्रमुख कार्यउदयपुर की स्थापना (1559), उदयसागर झील
बड़ी घटनाअकबर की चित्तौड़ घेराबंदी और तीसरा साका (1567-68)
संतान24 पुत्र, जिनमें महाराणा प्रताप सबसे बड़े
निधन28 फरवरी 1572, गोगुंदा
उत्तराधिकारीमहाराणा प्रताप (उदयसिंह ने जगमाल को चुना था)

प्रारंभिक जीवन: राणा सांगा के बेटे का कठिन बचपन

उदयसिंह का जन्म 4 अगस्त 1522 को चित्तौड़गढ़ में हुआ। वे राणा सांगा और रानी कर्णावती के बेटे थे। सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ में अस्थिरता का दौर आया। पहले रतनसिंह द्वितीय गद्दी पर बैठे, फिर उनकी हत्या के बाद विक्रमादित्य।

1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर हमला किया। इस हमले में चित्तौड़ का दूसरा साका हुआ। हमले से पहले बालक उदयसिंह को सुरक्षा के लिए बूंदी भेज दिया गया था।

पन्ना धाय का बलिदान और बनवीर

बनवीर राणा सांगा के बड़े भाई पृथ्वीराज का दासी-पुत्र था। 1536 में उसने कुछ असंतुष्ट सरदारों के साथ मिलकर विक्रमादित्य की हत्या कर दी और खुद गद्दी पर बैठ गया। उसकी राह में आखिरी कांटा था बालक उदयसिंह।

उदयसिंह की धाय (दूध पिलाने और पालने वाली मां) थीं पन्ना, जो खींची चौहान परिवार से थीं। जब बनवीर तलवार लेकर रनिवास पहुंचा, पन्ना ने उदयसिंह को पहले ही टोकरी में छिपाकर एक सेवक के साथ किले से बाहर भिजवा दिया था। बिस्तर पर उनका अपना बेटा चंदन सोया था। बनवीर ने पूछा तो पन्ना ने उसी बिस्तर की ओर इशारा कर दिया, और बनवीर ने चंदन को मार डाला।

इसके बाद पन्ना धाय उदयसिंह को लेकर अरावली के रास्ते निकलीं। रास्ते में भीलों ने उन्हें खाना और आश्रय दिया। आखिर वे कुंभलगढ़ पहुंचीं, जहां के किलेदार आशा शाह देपुरा (जैन व्यापारी परिवार से) ने बालक को अपना भतीजा बताकर पाला।

राज्याभिषेक और मावली का युद्ध (1540)

कुंभलगढ़ में रहते हुए धीरे-धीरे मेवाड़ के सरदारों को पता चला कि सांगा का बेटा ज़िंदा है। सरदारों ने कुंभलगढ़ में ही उदयसिंह का राज्याभिषेक किया। इसके वर्ष को लेकर स्रोतों में फर्क है: भारतकोश 1537 बताता है, कुछ स्रोत 1539 और ज़्यादातर अंग्रेज़ी संदर्भ 1540।

1540 में मेवाड़ और मारवाड़ के सरदारों के सहयोग से उदयसिंह चित्तौड़ की ओर बढ़े। मावली के पास बनवीर से युद्ध हुआ और बनवीर हार गया। उसकी मौत युद्ध में हुई या वह भाग निकला, इस पर स्रोत एकमत नहीं हैं। इसके बाद उदयसिंह ने चित्तौड़ में प्रवेश किया। इसी साल कुंभलगढ़ में उनके बड़े बेटे प्रताप का जन्म हुआ।

महाराणा उदयसिंह के शासन की मुख्य घटनाएं

वर्षघटना
15224 अगस्त को चित्तौड़ में जन्म
1535बहादुरशाह का चित्तौड़ पर हमला, उदयसिंह बूंदी भेजे गए
1536बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या की, पन्ना धाय ने उदयसिंह को बचाया
1540मावली में बनवीर की हार, चित्तौड़ पर अधिकार, कुंभलगढ़ में प्रताप का जन्म
1544शेरशाह सूरी को शर्त के साथ चित्तौड़ सौंपा
1559उदयपुर की नींव, बेड़च नदी पर बांध (उदयसागर)
1562मालवा के बाज़बहादुर को शरण दी
1567-68अकबर की चित्तौड़ घेराबंदी, उदयसिंह गोगुंदा गए, तीसरा साका
157228 फरवरी को गोगुंदा में निधन

शेरशाह सूरी को चित्तौड़ सौंपना (1544)

1544 में शेरशाह सूरी ने राजपूताना पर अभियान चलाया। मेवाड़ अभी-अभी गृहयुद्ध से निकला था और इतनी बड़ी सेना से लड़ने के साधन नहीं थे। उदयसिंह ने इस शर्त पर चित्तौड़ सौंप दिया कि मेवाड़ की प्रजा को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। शेरशाह ने लंबी घेराबंदी से बचने के लिए यह बात मान ली।

बाज़बहादुर को शरण (1562)

1562 में अकबर ने मालवा को जीत लिया। मालवा का आखिरी सुल्तान बाज़बहादुर भागकर मेवाड़ आया और उदयसिंह ने उसे शरण दी। अकबर की नज़र में यह मेवाड़ की खुली चुनौती थी, और आगे चलकर चित्तौड़ पर हमले का एक कारण बना।

उदयपुर की स्थापना और उदयसागर झील

उदयसिंह ने समझ लिया था कि चित्तौड़ का किला एक ऊंचे पठार पर है, जो तोपखाने के ज़माने में बार-बार घेराबंदी झेल चुका है। इसलिए उन्होंने अरावली की गिरवा घाटी में नई राजधानी बसाने का काम शुरू किया। 1559 में उदयपुर की नींव पड़ी।

लोक मान्यता है कि शिकार के दौरान पिछोला झील के पास उदयसिंह की मुलाकात एक साधु से हुई। साधु ने उसी जगह महल बनाने का आशीर्वाद दिया और कहा कि यह जगह सुरक्षित रहेगी। उदयपुर में धूणी माता का स्थान इसी कथा से जोड़ा जाता है।

उसी साल उन्होंने उदयपुर से करीब 13 किलोमीटर पूर्व में बेड़च नदी पर बांध बनवाया। इससे बनी झील उन्हीं के नाम पर उदयसागर कहलाई। झील का काम कुछ साल चला, इसके पूरा होने का साल स्रोतों में 1562 से 1565 के बीच बताया गया है। खेती और पानी की ज़रूरत के लिए बनी यह झील आज भी उदयपुर की प्रमुख झीलों में गिनी जाती है।

1568 में चित्तौड़ हाथ से निकलने के बाद उदयपुर ही मेवाड़ की असली राजधानी बना और 1818 तक, जब मेवाड़ ब्रिटिश संरक्षण में आया, यही राजधानी रहा।

चित्तौड़ का तीसरा साका (1567-68) और उदयसिंह का फैसला

अक्टूबर 1567 में अकबर ने विशाल सेना के साथ चित्तौड़ के पास डेरा डाला। सरदारों की सलाह पर उदयसिंह परिवार और खज़ाने के साथ पहाड़ों में गोगुंदा चले गए। किले की रक्षा की ज़िम्मेदारी राव जयमल राठौड़ और पत्ता सिसोदिया को मिली।

करीब चार महीने की घेराबंदी के बाद 23 फरवरी 1568 को चित्तौड़ का किला मुगलों के हाथ में चला गया। जयमल और पत्ता वीरगति को प्राप्त हुए और किले में जौहर हुआ। यह चित्तौड़ का तीसरा साका था। साका यानी वह घड़ी जब पुरुष केसरिया बाना पहनकर आखिरी युद्ध में उतरते थे और स्त्रियां जौहर (आग में आत्मबलिदान) करती थीं। अकबर किला तो ले सका, पर मेवाड़ का शासक और खज़ाना उसके हाथ नहीं आए।

क्या उदयसिंह का किला छोड़ना कायरता थी?

यह मेवाड़ के इतिहास का सबसे बहस वाला सवाल है। बाद के कई कवियों और लेखकों ने उदयसिंह को विलासी और कमज़ोर शासक के रूप में दिखाया, खासकर प्रताप की वीरता से तुलना करते हुए।

दूसरा पक्ष कहता है कि यह फैसला सरदारों की सलाह से हुआ और रणनीति के हिसाब से सही था। अगर शासक किले में फंसकर मारा जाता, तो मेवाड़ का राजवंश ही खत्म हो सकता था। उदयसिंह के बाहर रहने से राज्य, खज़ाना और उत्तराधिकारी बचे रहे, और यहीं से प्रताप की लंबी लड़ाई की ज़मीन तैयार हुई। उदयपुर को पहले से राजधानी के रूप में तैयार करना भी उनकी दूरदर्शिता दिखाता है।

महाराणा उदयसिंह की मृत्यु और उत्तराधिकार

चित्तौड़ के पतन के चार साल बाद, 28 फरवरी 1572 को गोगुंदा में उदयसिंह का निधन हुआ। उनकी कई रानियां और 24 पुत्र थे। सबसे बड़े पुत्र प्रताप की मां जयवंता बाई सोनगरा (जालौर के चौहान परिवार से) थीं।

उदयसिंह ने अपनी प्रिय रानी के बेटे जगमाल को उत्तराधिकारी चुना था। पर मेवाड़ के सरदारों ने यह फैसला नहीं माना। अंतिम संस्कार के बाद उन्होंने जगमाल को गद्दी से हटाया और गोगुंदा में ही प्रताप का राजतिलक किया। नाराज़ जगमाल अकबर के पास चला गया।

महाराणा उदयसिंह से जुड़े स्थल

  • चित्तौड़गढ़ किला: जन्मस्थान, जहां पन्ना धाय की घटना और तीसरा साका हुआ।
  • कुंभलगढ़ किला (राजसमंद): जहां बचपन छिपकर बीता, राज्याभिषेक हुआ और प्रताप का जन्म हुआ।
  • उदयपुर शहर: 1559 में बसाया गया, सिटी पैलेस और पिछोला का इलाका।
  • उदयसागर झील: उदयपुर से करीब 13 किलोमीटर पूर्व, बेड़च नदी पर।
  • गोगुंदा (उदयपुर): घेराबंदी के समय का ठिकाना, निधन स्थल और प्रताप का राजतिलक स्थल।

उदयपुर घूमने वालों के लिए टिप ज़्यादातर लोग पिछोला और फतहसागर देखकर लौट जाते हैं। अगर उदयसिंह से जुड़ा इतिहास देखना है, तो शहर से निकलकर उदयसागर झील पर सूर्यास्त देखें और एक दिन गोगुंदा के लिए रखें। कुंभलगढ़ उदयपुर से एक दिन की ट्रिप में आराम से हो जाता है।

परीक्षा के लिए महाराणा उदयसिंह से जुड़े तथ्य

  • जन्म: 4 अगस्त 1522, चित्तौड़गढ़; पिता राणा सांगा, माता रानी कर्णावती
  • पन्ना धाय (खींची चौहान) ने अपने बेटे चंदन का बलिदान देकर बचाया
  • कुंभलगढ़ के किलेदार आशा शाह देपुरा ने शरण दी, कुंभलगढ़ में राज्याभिषेक
  • मावली का युद्ध (1540): बनवीर की हार, उदयसिंह का चित्तौड़ पर अधिकार
  • 1544 में शेरशाह सूरी को चित्तौड़ सौंपा
  • उदयपुर की स्थापना: 1559, गिरवा घाटी में
  • उदयसागर झील: बेड़च नदी पर बांध, 1559 में काम शुरू
  • 1562 में मालवा के बाज़बहादुर को शरण
  • चित्तौड़ का तीसरा साका: 1567-68, रक्षक जयमल-पत्ता, किला 23 फरवरी 1568 को अकबर के हाथ
  • निधन: 28 फरवरी 1572, गोगुंदा; जगमाल को हटाकर प्रताप का राजतिलक

महाराणा उदयसिंह से जुड़े सवाल (FAQ)

महाराणा उदयसिंह कौन थे?

उदयसिंह द्वितीय मेवाड़ के सिसोदिया शासक थे। वे राणा सांगा के बेटे, महाराणा प्रताप के पिता और उदयपुर शहर के संस्थापक थे।

उदयपुर की स्थापना किसने और कब की?

उदयपुर की स्थापना महाराणा उदयसिंह ने 1559 में अरावली की गिरवा घाटी में की थी। चित्तौड़ के पतन (1568) के बाद यही मेवाड़ की राजधानी बना।

पन्ना धाय ने उदयसिंह को कैसे बचाया?

बनवीर के हमले से पहले पन्ना धाय ने उदयसिंह को टोकरी में छिपाकर किले से बाहर भिजवाया और उनकी जगह अपने बेटे चंदन को बिस्तर पर सुलाया। बनवीर ने चंदन को मार दिया और उदयसिंह कुंभलगढ़ पहुंचकर बच गए।

उदयसिंह का राज्याभिषेक कहां हुआ था?

कुंभलगढ़ किले में। वर्ष को लेकर मतभेद है (1537 से 1540), पर बनवीर को हराकर चित्तौड़ पर अधिकार 1540 में हुआ।

उदयसिंह ने चित्तौड़ का किला क्यों छोड़ा?

1567 में अकबर की घेराबंदी के समय सरदारों की सलाह पर वे राजपरिवार और खज़ाने के साथ गोगुंदा चले गए, ताकि राजवंश सुरक्षित रहे। किले की रक्षा जयमल और पत्ता ने की।

उदयसागर झील किसने बनवाई?

महाराणा उदयसिंह ने 1559 में बेड़च नदी पर बांध बनवाकर उदयसागर झील बनवाई। यह उदयपुर से करीब 13 किलोमीटर पूर्व में है।

महाराणा उदयसिंह की मृत्यु कब और कहां हुई?

28 फरवरी 1572 को गोगुंदा में। इसके बाद सरदारों ने जगमाल की जगह प्रताप को महाराणा बनाया।

उदयसिंह के कितने पुत्र थे?

उनके 24 पुत्र थे। इनमें महाराणा प्रताप सबसे बड़े थे, और शक्तिसिंह व जगमाल भी इतिहास में प्रसिद्ध हैं।

महाराणा उदयसिंह का इतिहास पढ़ते समय पन्ना धाय, मावली, उदयपुर की स्थापना और तीसरे साके की तारीखें एक क्रम में याद करें, परीक्षा में ये चारों जोड़कर पूछी जाती हैं। इसी कड़ी में महाराणा प्रताप, भामाशाह और दिवेर के युद्ध की कहानी भी पढ़ें।

ये भी पढ़ें

स्रोत: भारतकोश, RajRAS (उदयपुर के शासक), Chittorgarh.com (पन्ना धाय), Incredible India, पर्यटन मंत्रालय (उदयसागर), Drishti IAS, Wikipedia (Udai Singh II और उसके संदर्भ ग्रंथ)

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