भानगढ़ किले की कहानी 1573 से शुरू होती है, जब आमेर के राजा भगवंतदास ने अलवर ज़िले में सरिस्का के किनारे यह किला और शहर बसाया। आज इसे भारत का सबसे "डरावना" किला कहा जाता है, लेकिन इसकी वीरानी के पीछे भूतों से ज़्यादा पानी की कमी, अकाल और राजनीति की कहानी है।
{tocify} $title={विषय सूची}
| किले का नाम | भानगढ़ किला |
| जगह | गोला का बास गांव के पास, ज़िला अलवर, राजस्थान |
| किसने बनवाया | आमेर के राजा भगवंतदास |
| कब | 1573 |
| किसके लिए | छोटे बेटे माधोसिंह (मानसिंह के भाई) के रहने के लिए |
| राजवंश | कछवाहा |
| देखरेख | भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) |
| जयपुर से दूरी | करीब 80-85 किलोमीटर |
भानगढ़ किले का इतिहास
भानगढ़ एक किले से ज़्यादा एक पूरा बसा-बसाया शहर था। राजा भगवंतदास ने 1573 में इसे अपने दूसरे बेटे माधोसिंह के लिए बनवाया। माधोसिंह, आमेर के मशहूर मानसिंह के छोटे भाई थे और अकबर के दरबार में दीवान रहे। उन्होंने भानगढ़ को अपनी राजधानी बनाया और 1605 तक यहां रहे।
स्थानीय इतिहास के अनुसार माधोसिंह के बाद उनके बेटे छत्रसिंह गद्दी पर बैठे, जो 1630 में एक लड़ाई में मारे गए। इसके बाद भानगढ़ की रौनक कम होने लगी। छत्रसिंह के बेटे अजबसिंह ने पास ही अजबगढ़ नाम का नया कस्बा बसाया और वहीं चले गए। 1720 में जयपुर के सवाई जयसिंह ने भानगढ़ को अपने राज्य में मिला लिया।
ये भी पढ़ें: महाराणा प्रताप का इतिहास: वो योद्धा जिसने अकबर की अधीनता कभी नहीं मानी
शहर खाली क्यों हुआ
भानगढ़ के उजड़ने की सबसे बड़ी वजह पानी की कमी मानी जाती है। अरावली की इन पहाड़ियों में बड़ी आबादी के लिए पानी जुटाना हमेशा मुश्किल रहा। 1783 के अकाल ने रही-सही कसर पूरी कर दी, और लोग धीरे-धीरे यहां से चले गए। जो शहर बचा, वह खंडहर में बदलता गया।
भानगढ़ की कहानियां: लोक मान्यता क्या कहती है
भानगढ़ की "डरावनी" छवि दो किंवदंतियों से बनी है। ध्यान रहे, ये लोक कथाएं हैं, इतिहास के प्रमाण नहीं।
साधु और ऊंचे घर की शर्त
लोक मान्यता है कि किला बनने से पहले यहां एक साधु रहते थे। उन्होंने शर्त रखी थी कि शहर का कोई घर उनके घर से ऊंचा नहीं होगा, और जिस दिन किसी इमारत की छाया उनके घर पर पड़ी, शहर नष्ट हो जाएगा। कथा के अनुसार एक दिन ऐसा ही हुआ। स्थानीय लोग इन साधु को गुरु बालूनाथ के नाम से याद करते हैं।
राजकुमारी रत्नावती और तांत्रिक
दूसरी कथा राजकुमारी रत्नावती की है, जिनकी सुंदरता की चर्चा दूर-दूर तक थी। कथा के अनुसार काला जादू जानने वाला एक तांत्रिक उन पर मोहित हो गया। उसका नाम कहीं सिंघिया तो कहीं सिंधु सेवड़ा बताया जाता है। उसने बाज़ार में राजकुमारी के लिए जा रहे इत्र या तेल पर वशीकरण कर दिया। राजकुमारी ने चाल पहचान ली और उसे एक पत्थर पर फेंक दिया। वही पत्थर लुढ़ककर तांत्रिक पर गिरा, और मरते-मरते उसने पूरे भानगढ़ को उजड़ने का श्राप दे दिया।
यही कहानी आगे चलकर इतनी मशहूर हुई कि इस पर राजस्थानी फिल्म "भूतों का भानगढ़" भी बनी।
सच क्या है: सूर्यास्त के बाद रोक क्यों?
भानगढ़ के बारे में सबसे ज़्यादा पूछी जाने वाली बात ASI का वह बोर्ड है, जिस पर लिखा है कि सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद किले में रुकना मना है। लोग इसे भूतों का सबूत मान लेते हैं, लेकिन ASI इसे पर्यटकों की सुरक्षा के लिए लगाया गया नियम बताता है।
इसके पीछे ठोस कारण हैं। किला सरिस्का बाघ परियोजना के किनारे जंगल में है, आसपास रात में रोशनी नहीं है, और खंडहर की दीवारें और सीढ़ियां अंधेरे में खतरनाक हो सकती हैं। यहां काम करने वाले कर्मचारियों का भी कहना है कि उन्हें कभी डराने वाला कोई अनुभव नहीं हुआ। रात में ठंड लगने या किसी के पीछे चलने जैसे जो किस्से सुनाए जाते हैं, उनकी कभी वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई।
एक और बात जो लोग अक्सर नहीं जानते: खुदाई और अवशेषों से साफ है कि भानगढ़ कभी एक समृद्ध शहर था, जिसमें बाज़ार, मंदिर, हवेलियां और महल थे।
भानगढ़ किले में क्या देखें
- दरवाज़े: मुख्य द्वार के अलावा लाहौरी, अजमेरी, फुलबाड़ी और दिल्ली दरवाज़ा
- जौहरी बाज़ार: दोनों तरफ दुकानों के खंडहर, जिनसे शहर के व्यापार का अंदाज़ा मिलता है
- मंदिर: हनुमान, गोपीनाथ, सोमेश्वर, केशवराय, मंगला देवी और गणेश मंदिर। गोपीनाथ मंदिर करीब 14 फुट ऊंचे चबूतरे पर बना है और पीले पत्थर की नक्काशी के लिए जाना जाता है
- पुरोहित जी की हवेली और नाचन की हवेली (नर्तकियों का महल)
- राजमहल: किले की सीमा के सबसे आखिरी छोर पर
लोक कथा में कहा जाता है कि श्राप से पूरा शहर उजड़ गया, पर मंदिर बच गए थे।
भानगढ़ घूमने की जानकारी
- कैसे पहुंचें: जयपुर से करीब 80-85 किलोमीटर, दौसा होकर सड़क से। दिल्ली से करीब 235 किलोमीटर। थानागाज़ी से करीब 32 किलोमीटर। आखिरी करीब 2 किलोमीटर का रास्ता कच्चा है
- पास का गांव: गोला का बास
- खुलने का समय: सूर्योदय से सूर्यास्त तक (यात्रा से पहले पुष्टि करें)
- टिकट: ASI समय-समय पर टिकट बदलता है, गेट पर या ASI की वेबसाइट पर देख लें
- कितना समय लगेगा: पूरा किला आराम से देखने में 2-3 घंटे
घूमने का टिप जयपुर से सुबह जल्दी निकलें, ताकि दोपहर की तेज़ धूप से पहले महल तक की चढ़ाई हो जाए। पास में ही अजबगढ़ के खंडहर और सरिस्का भी हैं, समय हो तो एक ही दिन में जोड़ सकते हैं। अक्टूबर से मार्च के बीच जाना सबसे आरामदायक रहता है।
- सूर्यास्त के बाद किले में रुकने की कोशिश न करें, यह ASI के नियम के खिलाफ है
- खंडहर की दीवारों और टूटी सीढ़ियों पर न चढ़ें
- दीवारों पर नाम न लिखें, यह संरक्षित स्मारक है
परीक्षा के लिए भानगढ़ किले से जुड़े तथ्य
- भानगढ़ किला अलवर ज़िले में सरिस्का के पास है
- निर्माण: 1573, आमेर के राजा भगवंतदास
- भगवंतदास ने इसे अपने बेटे माधोसिंह के लिए बनवाया
- अजबगढ़ कस्बा अजबसिंह ने बसाया
- किले की देखरेख ASI करता है
भानगढ़ किले से जुड़े सवाल
भानगढ़ का किला किसने बनवाया?
आमेर के राजा भगवंतदास ने 1573 में अपने बेटे माधोसिंह के लिए भानगढ़ का किला बनवाया।
भानगढ़ किला किस ज़िले में है?
राजस्थान के अलवर ज़िले में, सरिस्का बाघ परियोजना के किनारे, गोला का बास गांव के पास।
क्या भानगढ़ किला सच में भूतिया है?
भूतों की बातें लोक कथाओं पर आधारित हैं, इनका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। शहर असल में पानी की कमी और 1783 के अकाल के बाद उजड़ा।
भानगढ़ में रात को जाना मना क्यों है?
ASI ने सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद रुकने पर रोक पर्यटकों की सुरक्षा के लिए लगाई है, क्योंकि किला जंगल के किनारे है और रात में रोशनी नहीं होती।
जयपुर से भानगढ़ कितना दूर है?
करीब 80-85 किलोमीटर। सड़क से 2 से 2.5 घंटे लगते हैं।
राजकुमारी रत्नावती की कहानी क्या है?
लोक कथा के अनुसार एक तांत्रिक ने राजकुमारी पर वशीकरण करना चाहा, चाल नाकाम हुई और मरते समय उसने भानगढ़ को श्राप दिया। यह किंवदंती है, इतिहास नहीं।
ये भी पढ़ें
- राजस्थान के प्रमुख किले
- राजस्थान के इतिहास की रोचक कहानियां
- अलवर ज़िले की सभी पोस्ट
- हल्दीघाटी का युद्ध: 18 जून 1576 को असल में क्या हुआ? पूरी कहानी
भानगढ़ किले की कहानी डर से ज़्यादा एक उजड़े शहर की कहानी है। अगर आप जा रहे हैं, तो भूत ढूंढने की जगह गोपीनाथ मंदिर की नक्काशी और जौहरी बाज़ार की कतारें ध्यान से देखिए, वहां 400 साल पुराने शहर की असली ज़िंदगी दिखती है।
स्रोत: राजस्थान पत्रिका; MNIT जयपुर; भारतकोश; Wikipedia।




