1536 की एक रात चित्तौड़ के महल में चीख गूंजी। महाराणा विक्रमादित्य की हत्या हो चुकी थी और हत्यारा बनवीर अब 14 साल के राजकुमार उदयसिंह की तरफ बढ़ रहा था। पन्नाधाय का इतिहास इसी रात से पहचाना जाता है: उदयसिंह की धाय (दूध पिलाने और पालने वाली मां) पन्ना ने राजकुमार को टोकरी में छिपाकर किले से बाहर भिजवाया और उसके बिस्तर पर अपने बेटे चंदन को सुला दिया। बनवीर की तलवार चंदन पर चली, और मेवाड़ का वारिस बच गया।
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| नाम | पन्नाधाय (पन्ना धाय) |
| काल | 16वीं सदी, महाराणा सांगा से उदयसिंह तक का समय |
| जन्म स्थान | माताजी की पांडोली गांव, चित्तौड़गढ़ के पास (राजस्थान धरोहर प्राधिकरण के अनुसार) |
| पिता | हरचंद हांकला |
| पति | सूरजमल, चित्तौड़ की सेना में सैनिक |
| पुत्र | चंदन, जिसकी बलि देकर उदयसिंह को बचाया |
| किसकी धाय | राजकुमार उदयसिंह (बाद में महाराणा उदयसिंह द्वितीय) |
| मुख्य घटना | बनवीर द्वारा विक्रमादित्य की हत्या (1536 ई.) के बाद उदयसिंह को बचाना |
| शरण कहां मिली | कुंभलगढ़, किलेदार आशा शाह देपुरा के यहां |
| स्मारक | पन्नाधाय पैनोरमा, कमेरी (राजसमंद), 2018 में खुला |
पन्नाधाय का इतिहास: कौन थीं, परिवार और राजमहल तक का सफर
पन्नाधाय मेवाड़ के राजपरिवार में उदयसिंह की धाय थीं। "धाय" उस महिला को कहते थे जो रानी के बच्चे को अपना दूध पिलाती और पालती थी। राजघराने में धाय का दर्जा मां जैसा माना जाता था, इसलिए लोग उन्हें आज भी "धाय मां" कहते हैं।
राजस्थान सरकार के धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण के अनुसार उनका जन्म चित्तौड़ के पास पांडोली गांव में हरचंद हांकला के घर हुआ। उनकी शादी कमेरी गांव के सूरजमल से हुई, जो चित्तौड़ की सेना में थे। राजसमंद के पैनोरमा में दिखाया गया है कि सूरजमल गुजरात के बहादुरशाह के हमले के समय युद्ध में मारे गए।
पन्ना के बेटे चंदन और राजकुमार उदयसिंह की उम्र लगभग बराबर थी। दोनों साथ खेलते और साथ बड़े हुए। उदयसिंह महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) और रानी कर्णावती के बेटे थे, और उनका जन्म 1522 ई. में चित्तौड़ में हुआ था।
पन्नाधाय की जाति और जन्म वर्ष पर अलग-अलग मत
यहां इतिहास की किताबें एक राय नहीं रखतीं, और यह बात साफ जानना ज़रूरी है:
- गुर्जर मत: राजस्थान धरोहर प्राधिकरण का पैनोरमा, कई प्रतियोगी परीक्षा स्रोत और स्थानीय परंपरा उन्हें पांडोली के गुर्जर परिवार से बताते हैं। उनके पति सूरजमल को चौहान गोत्र का गुर्जर लिखा गया है।
- खींची राजपूत मत: कर्नल जेम्स टॉड ने "एनल्स एंड एंटीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान" में उन्हें खींची वंश की राजपूतानी लिखा है। केंद्र सरकार के प्रकाशन विभाग की किताब "भारत के नारी रत्न" में भी यही लिखा गया।
अगस्त 2026 में इसी किताब को लेकर उदयपुर में गुर्जर समाज ने कलेक्टर को ज्ञापन देकर सुधार की मांग की थी। जन्म वर्ष को लेकर भी स्रोतों में फर्क है: कुछ जगह 1490 ई. और कुछ जगह 1501 ई. लिखा मिलता है। इसलिए किसी एक वर्ष को पक्का मानकर याद न करें।
पन्नाधाय की कहानी की पृष्ठभूमि: सांगा के बाद का बिखरा मेवाड़
1527 में खानवा के युद्ध में बाबर से हार के बाद 1528 में राणा सांगा की मृत्यु हो गई। इसके बाद मेवाड़ कमज़ोर हाथों में चला गया। पहले रतनसिंह द्वितीय गद्दी पर बैठे, फिर 1531 में उनके भाई विक्रमादित्य राणा बने।
इतिहासकार रीमा हूजा के अनुसार विक्रमादित्य घमंडी और गुस्सैल स्वभाव के थे। उन्होंने भरे दरबार में बुज़ुर्ग सरदारों का अपमान किया, जिससे कई सामंत नाराज़ होकर दरबार छोड़ गए। इसी कमज़ोरी का फायदा गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने उठाया।
1535 में बहादुरशाह ने चित्तौड़ जीत लिया। रानी कर्णावती ने किले की स्त्रियों के साथ जौहर (शत्रु के हाथ पड़ने से बचने के लिए सामूहिक अग्नि-प्रवेश) किया। यह चित्तौड़ का दूसरा साका था, जिसकी पूरी कहानी चित्तौड़गढ़ के तीन साके वाली पोस्ट में है। उस समय उदयसिंह को पन्नाधाय के साथ सुरक्षित बूंदी भेज दिया गया था, जो उनका ननिहाल था।
बहादुरशाह ज़्यादा दिन चित्तौड़ पर टिक नहीं पाया और सिसोदिया सरदारों ने किला वापस ले लिया। विक्रमादित्य फिर राणा बने, लेकिन उनका स्वभाव नहीं बदला।
पन्नाधाय का बलिदान: 1536 की वह रात
बनवीर, राणा सांगा के बड़े भाई पृथ्वीराज का दासी से हुआ बेटा था। नाराज़ सरदारों के साथ से वह दरबार में ताकतवर हो गया। 1536 ई. में उसने एक रात महल में घुसकर विक्रमादित्य की हत्या कर दी। कुछ किताबों में यह वर्ष 1537 भी लिखा मिलता है।
बनवीर जानता था कि जब तक सांगा का आखिरी बेटा उदयसिंह ज़िंदा है, उसकी गद्दी पक्की नहीं। इसलिए उसी रात वह तलवार लेकर उदयसिंह के कक्ष की ओर चला।
कीरत बारी और फलों की टोकरी
टॉड के वर्णन के अनुसार महल में चीख-पुकार सुनकर पन्ना सतर्क हो गईं। रात का भोजन उठाने आए सेवक (बारी) ने उन्हें बताया कि राणा मारे जा चुके हैं। हिंदी स्रोतों में इस सेवक का नाम कीरत बारी मिलता है।
पन्ना ने एक पल भी नहीं गंवाया। उन्होंने सोए हुए उदयसिंह को फलों की टोकरी में लिटाया, ऊपर से पत्ते ढके और टोकरी कीरत बारी के हाथ किले से बाहर भिजवा दी। तय हुआ कि वह किले के पश्चिम में बेड़च नदी के किनारे इंतज़ार करेगा।
चंदन का बलिदान
अब बिस्तर खाली था, और बनवीर कभी भी पहुंच सकता था। पन्ना ने अपने बेटे चंदन को उदयसिंह के बिस्तर पर सुला दिया। बनवीर ने आकर पूछा कि उदयसिंह कहां है। पन्ना ने चुपचाप बिस्तर की ओर इशारा किया, और उनकी आंखों के सामने बनवीर ने चंदन को मार डाला।
इस घटना में सबसे ज़्यादा जो बात झकझोरती है, वह है उसके बाद पन्ना का धीरज। बेटे को खोने के तुरंत बाद वे किले से निकलकर बेड़च के किनारे पहुंचीं, ताकि राजकुमार को सुरक्षित जगह ले जा सकें।
एक ज़रूरी बात टॉड ने उदयसिंह को उस समय 6 साल का लिखा है, लेकिन 1522 के जन्म वर्ष के हिसाब से 1536 में उनकी उम्र करीब 14 साल बनती है। आधुनिक इतिहासकार इसी हिसाब को मानते हैं। इसलिए "छोटे बच्चे को टोकरी में" वाली तस्वीर पूरी तरह सही नहीं, किशोर राजकुमार को छिपाकर निकाला गया था।
उदयसिंह को लेकर कुंभलगढ़ तक का सफर
किले से निकलने के बाद पन्ना के सामने सबसे बड़ा सवाल था: बनवीर के डर से कौन शरण देगा? टॉड के अनुसार वे पहले देवलिया (आज का प्रतापगढ़ क्षेत्र) के रावत के पास गईं, फिर डूंगरपुर के रावल आसकरण के पास, लेकिन दोनों जगह खुलकर शरण नहीं मिली।
इसके बाद वे अरावली की घाटियों से लंबा और घुमावदार रास्ता लेकर आगे बढ़ीं। इस सफर में भीलों ने उनकी रक्षा की। आखिर वे कुंभलगढ़ किले पहुंचीं।
आशा शाह देपुरा ने दी शरण
कुंभलगढ़ के किलेदार आशा शाह देपुरा थे। टॉड उन्हें जैन लिखते हैं, जबकि कुछ आधुनिक स्रोत उन्हें माहेश्वरी महाजन बताते हैं। टॉड के अनुसार आशा शाह पहले हिचकिचाए, लेकिन पन्ना ने उन्हें स्वामी के प्रति उनका फर्ज़ याद दिलाया। आखिर आशा शाह ने उदयसिंह को अपना भतीजा बताकर अपने पास रख लिया।
शक न हो, इसलिए पन्ना कुछ समय बाद वहां से दूर चली गईं। उदयसिंह करीब दो-तीन साल कुंभलगढ़ में आशा शाह के भतीजे की पहचान के साथ पले।
बनवीर का अंत और पन्नाधाय की गवाही
धीरे-धीरे खबर फैलने लगी कि कुंभलगढ़ में "आशा शाह का भतीजा" असल में सांगा का बेटा है। बनवीर ने इसे झूठ बताया, लेकिन मेवाड़ के सरदार कुंभलगढ़ पहुंचे। वहां पन्ना ने पूरी कहानी सुनाई और उनकी गवाही से उदयसिंह की पहचान पक्की हुई। बूंदी के ननिहाल वाले भी उन्हें पहचानते थे।
हिंदी के ज़्यादातर स्रोत बताते हैं कि 1537 ई. में कुंभलगढ़ में सरदारों ने उदयसिंह का राज्याभिषेक किया। कुछ अंग्रेज़ी स्रोत राज्याभिषेक 1540 में मानते हैं। जोधपुर के राव मालदेव ने भी उदयसिंह का साथ दिया।
1540 ई. में मावली के पास हुए युद्ध में उदयसिंह की सेना ने बनवीर को हराया और चित्तौड़ पर फिर अधिकार कर लिया। बनवीर के अंत पर भी दो बातें मिलती हैं: इतिहासकार रीमा हूजा और आर.वी. सोमानी के अनुसार वह युद्ध में मारा गया, जबकि टॉड लिखते हैं कि उसे परिवार के साथ जाने दिया गया और वह दक्षिण भारत चला गया।
इसी साल, 1540 में, उदयसिंह के बड़े बेटे महाराणा प्रताप का जन्म हुआ। यानी पन्ना ने जिस बच्चे को बचाया, उसी के बेटे ने आगे हल्दीघाटी और दिवेर में मेवाड़ की लड़ाई लड़ी। उदयसिंह के पूरे शासनकाल और उदयपुर बसाने की कहानी महाराणा उदयसिंह का इतिहास में पढ़ सकते हैं।
राजसमंद पैनोरमा की जानकारी के अनुसार चित्तौड़ वापस मिलने के बाद पन्ना भी चित्तौड़ लौट आईं। इसके बाद उनके जीवन के बारे में पक्का लिखित ब्योरा नहीं मिलता।
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1522 ई. | चित्तौड़ में उदयसिंह का जन्म |
| 1528 ई. | खानवा के बाद राणा सांगा की मृत्यु |
| 1531 ई. | विक्रमादित्य मेवाड़ के राणा बने |
| 1535 ई. | बहादुरशाह का हमला, रानी कर्णावती का जौहर; उदयसिंह बूंदी भेजे गए |
| 1536 ई. | बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या की; पन्ना ने चंदन की बलि देकर उदयसिंह को बचाया |
| 1537 ई. | कुंभलगढ़ में उदयसिंह का राज्याभिषेक (हिंदी स्रोतों के अनुसार) |
| 1540 ई. | मावली के पास बनवीर की हार, उदयसिंह का चित्तौड़ पर अधिकार; महाराणा प्रताप का जन्म |
पन्नाधाय से जुड़ी कहानियां और आम गलतफहमियां
रानी कर्णावती ने सौंपी थी ज़िम्मेदारी
राजस्थान में प्रचलित कथा के अनुसार 1535 के जौहर से पहले रानी कर्णावती ने उदयसिंह की सुरक्षा का वचन पन्ना से लिया था। राजसमंद पैनोरमा में भी यह दृश्य दिखाया गया है। रानी कर्णावती की कहानी रानी कर्णावती का इतिहास में विस्तार से है।
हुमायूं को राखी वाली कहानी
इसी दौर की एक मशहूर कहानी है कि कर्णावती ने बहादुरशाह से बचने के लिए हुमायूं को राखी भेजी थी। इतिहासकार सतीश चंद्र जैसे विद्वान इसे बाद में गढ़ी गई कहानी मानते हैं, क्योंकि उस समय के समकालीन स्रोतों में इसका ज़िक्र नहीं मिलता।
पन्ना का नाम कैसे पड़ा
"पन्ना" का अर्थ है हरे रंग का रत्न (एमरल्ड)। टॉड ने भी उनके नाम का यही अर्थ लिखा है। राजस्थान में पन्नाधाय का नाम स्वामिभक्ति और त्याग की मिसाल के तौर पर लिया जाता है, और राज्य में उनकी याद में दो पैनोरमा बनाए गए हैं।
फिल्मों और किताबों में पन्नाधाय
1934 में "वीरांगना पन्ना" नाम की मूक (साइलेंट) फिल्म बनी थी। बांग्ला नाटककार शचींद्रनाथ सेनगुप्त ने "पन्ना धाय" नाम का नाटक लिखा, जिसका हिंदी अनुवाद भारतीय ज्ञानपीठ ने छापा।
पन्नाधाय से जुड़े स्थल: कहां देखें उनकी याद
पन्नाधाय पैनोरमा, कमेरी (राजसमंद)
राजसमंद ज़िले के कमेरी गांव के पास, आमेट से देवगढ़ रोड पर करीब 8 km दूर, अरावली की पहाड़ियों के बीच यह पैनोरमा बना है। कमेरी पन्ना के पति सूरजमल का गांव था। करीब 3.13 करोड़ रुपये की लागत से बना यह पैनोरमा 2018 में पर्यटकों के लिए खुला।
अंदर मूर्तियों और चित्रों के ज़रिए पूरी कहानी दिखाई गई है: उदयसिंह और चंदन का साथ शस्त्र सीखना, कर्णावती का जौहर, बनवीर द्वारा विक्रमादित्य की हत्या, और भेष बदलकर निकलती पन्ना।
पांडोली (चित्तौड़गढ़) में नया पैनोरमा
पन्नाधाय के जन्म गांव माताजी की पांडोली (चित्तौड़गढ़ से कपासन रोड पर करीब 10 km) में करीब 4 करोड़ रुपये का दूसरा पैनोरमा मंज़ूर हुआ। इसका निर्माण जुलाई 2023 में शुरू हुआ था।
चित्तौड़गढ़ किला
जिस महल में यह घटना हुई, वह चित्तौड़गढ़ किले के भीतर है। किले में राणा कुंभा के महल को उदयसिंह का जन्म स्थान माना जाता है। किले की पूरी जानकारी, टाइमिंग और टिकट के लिए चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास पढ़ें।
घूमने का टिप अगर आप चित्तौड़गढ़ से कुंभलगढ़ जा रहे हैं, तो रास्ते में राजसमंद का कमेरी पैनोरमा देख सकते हैं। पन्ना की यात्रा भी चित्तौड़ से कुंभलगढ़ की ही थी, इसलिए यह रूट उनकी कहानी के साथ जोड़कर घूमने का अच्छा तरीका है। पैनोरमा का समय और टिकट जाने से पहले स्थानीय स्तर पर पूछ लें (यात्रा से पहले पुष्टि करें)।
परीक्षा के लिए पन्नाधाय से जुड़े तथ्य
- पन्नाधाय महाराणा उदयसिंह द्वितीय की धाय मां थीं।
- उनके पुत्र का नाम चंदन था, जिसकी बलि देकर उन्होंने उदयसिंह को बचाया।
- हत्यारा बनवीर था, जो पृथ्वीराज (सांगा के भाई) का दासी पुत्र था। उसने 1536 ई. में विक्रमादित्य की हत्या की।
- उदयसिंह को टोकरी में किले से बाहर ले जाने वाले सेवक का नाम कीरत बारी बताया जाता है।
- कुंभलगढ़ के किलेदार आशा शाह देपुरा ने उदयसिंह को शरण दी।
- उदयसिंह का राज्याभिषेक कुंभलगढ़ में हुआ (हिंदी स्रोतों में 1537 ई.)।
- 1540 ई. में मावली के युद्ध में उदयसिंह ने बनवीर को हराया।
- पन्नाधाय पैनोरमा: कमेरी (राजसमंद) में 2018 से; पांडोली (चित्तौड़गढ़) में निर्माण 2023 से।
- सरकारी पैनोरमा के अनुसार पति सूरजमल, पिता हरचंद हांकला; जन्म गांव पांडोली।
पन्नाधाय के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पन्नाधाय कौन थी?
पन्नाधाय मेवाड़ के राजकुमार उदयसिंह की धाय मां थीं। 1536 में बनवीर से उदयसिंह को बचाने के लिए उन्होंने अपने बेटे चंदन की बलि दे दी थी।
पन्नाधाय के बेटे का नाम क्या था?
उनके बेटे का नाम चंदन था। पन्ना ने उसे उदयसिंह के बिस्तर पर सुला दिया और बनवीर ने उसे ही राजकुमार समझकर मार डाला।
पन्नाधाय ने किसकी जान बचाई थी?
महाराणा सांगा के सबसे छोटे बेटे उदयसिंह की, जो बाद में मेवाड़ के महाराणा बने, उदयपुर बसाया और महाराणा प्रताप के पिता थे।
बनवीर कौन था?
बनवीर राणा सांगा के भाई पृथ्वीराज का दासी से हुआ बेटा था। उसने 1536 में महाराणा विक्रमादित्य की हत्या करके चित्तौड़ की गद्दी हथिया ली थी।
पन्नाधाय किस जाति की थीं?
इस पर दो मत हैं। राजस्थान सरकार के पैनोरमा और स्थानीय परंपरा उन्हें गुर्जर परिवार से बताते हैं, जबकि कर्नल टॉड ने उन्हें खींची राजपूत लिखा है।
पन्नाधाय उदयसिंह को लेकर कहां गई थीं?
वे उदयसिंह को कुंभलगढ़ ले गईं, जहां किलेदार आशा शाह देपुरा ने उन्हें अपना भतीजा बताकर छिपाए रखा।
पन्नाधाय पैनोरमा कहां है?
पहला पैनोरमा राजसमंद ज़िले के कमेरी गांव के पास (आमेट-देवगढ़ रोड) है, जो 2018 में खुला। दूसरा उनके जन्म गांव पांडोली (चित्तौड़गढ़) में बन रहा है।
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- चित्तौड़गढ़ के तीन साके
- रानी कर्णावती का इतिहास
पन्नाधाय का इतिहास पढ़ने के बाद अगर आप चित्तौड़ जाएं, तो किले के पुराने महलों के बीच खड़े होकर 1536 की उस रात को याद ज़रूर करें। और कहानी का अगला हिस्सा, यानी उदयसिंह ने चित्तौड़ छोड़कर उदयपुर क्यों बसाया, ऊपर दी गई उदयसिंह वाली पोस्ट में मिलेगा।
स्रोत: राजस्थान धरोहर संरक्षण एवं प्रोन्नति प्राधिकरण – पन्नाधाय पैनोरमा; कर्नल जेम्स टॉड, Annals and Antiquities of Rajasthan; रीमा हूजा, A History of Rajasthan; आर.वी. सोमानी, History of Mewar; राजस्थान पत्रिका; ETV भारत।
