22 फरवरी 1568 की रात चित्तौड़ के किले में कई जगह एक साथ आग जली। बाहर अकबर की सेना थी, भीतर जयमल राठौड़ अभी-अभी मारे गए थे, और अगली सुबह होली थी। चित्तौड़गढ़ के तीन साके ऐसी ही तीन घड़ियां हैं: 1303 में अलाउद्दीन खिलजी, 1535 में गुजरात के बहादुरशाह और 1567-68 में अकबर के हमले के समय। तीनों बार हार तय दिखी, तो स्त्रियों ने जौहर किया और पुरुषों ने केसरिया पहनकर आखिरी लड़ाई लड़ी।
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| विषय | चित्तौड़गढ़ के तीन साके |
| स्थान | चित्तौड़गढ़ दुर्ग, चित्तौड़गढ़ ज़िला |
| पहला साका | 1303 ई.; आक्रमणकारी अलाउद्दीन खिलजी; शासक रतनसिंह |
| दूसरा साका | 1535 ई.; आक्रमणकारी बहादुरशाह (गुजरात); शासक विक्रमादित्य; जौहर रानी कर्णावती |
| तीसरा साका | 1567-68 ई.; आक्रमणकारी अकबर; शासक उदयसिंह; सेनापति जयमल-पत्ता |
| तीनों का परिणाम | तीनों बार किला आक्रमणकारी के हाथ गया |
| आज की याद | किले का जौहर स्थल, जयमल-कल्ला की छतरियां, हर साल जौहर मेला |
साका क्या होता है: जौहर और केसरिया
राजस्थानी इतिहास में "साका" उस घड़ी को कहते हैं जब किले में घिरे लोग समझ जाते थे कि अब बचना मुमकिन नहीं। तब दो काम एक साथ होते थे:
- जौहर: किले की स्त्रियां शत्रु के हाथ पड़ने से बचने के लिए सामूहिक रूप से अग्नि में प्रवेश करती थीं।
- केसरिया: पुरुष केसरिया (भगवा) बाना पहनकर, किले के दरवाज़े खोलकर, मरने-मारने के निश्चय से शत्रु पर टूट पड़ते थे।
जब दोनों हों, तो पूरा "साका" माना जाता है। अगर सिर्फ केसरिया हो और जौहर न हो, तो उसे "अर्द्ध साका" कहा गया, जैसे जैसलमेर का आधा साका। जौहर की परंपरा और राजस्थान के बाकी साकों पर पूरी पोस्ट जौहर और साका क्या है में है।
| साका | वर्ष | आक्रमणकारी | चित्तौड़ का शासक | प्रमुख नाम |
|---|---|---|---|---|
| पहला | 1303 ई. | अलाउद्दीन खिलजी (दिल्ली) | रतनसिंह | रानी पद्मिनी (परंपरा), गोरा-बादल (परंपरा) |
| दूसरा | 1535 ई. | बहादुरशाह (गुजरात) | विक्रमादित्य | रानी कर्णावती, रावत बाघसिंह |
| तीसरा | 1567-68 ई. | अकबर (मुगल) | उदयसिंह | जयमल राठौड़, पत्ता चूंडावत, कल्ला राठौड़ |
चित्तौड़ का पहला साका (1303): अलाउद्दीन खिलजी का घेरा
पृष्ठभूमि और कारण
13वीं सदी के आखिर तक दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी राजस्थान और गुजरात के बड़े किलों को जीतने में लगे थे। 1301 में रणथंभौर गिर चुका था। चित्तौड़ मेवाड़ का सबसे मज़बूत किला और उसकी राजधानी था, इसलिए उसे जीतना मेवाड़ को झुकाने जैसा था।
घटनाक्रम
28 जनवरी 1303 को अलाउद्दीन ने किले को घेरा। उसके साथ मौजूद कवि अमीर खुसरो ने "खज़ाइन-उल-फुतूह" में लिखा कि दो बार सीधे हमले नाकाम रहे और बरसात में सेना पहाड़ी की "कमर" तक ही पहुंच पाई। करीब सात महीने बाद, 26 अगस्त 1303 को किला गिरा।
राणा रतनसिंह का क्या हुआ, इस पर स्रोत अलग-अलग बात कहते हैं। खुसरो, बरनी और इसामी जैसे सुल्तानी लेखक लिखते हैं कि "राय" ने समर्पण किया और उसे माफ कर दिया गया। जैन लेखक कक्क सूरि (1336) के अनुसार अलाउद्दीन ने उसका धन ले लिया। 1460 की कुंभलगढ़ प्रशस्ति और 17वीं सदी के मुंहता नैणसी के अनुसार वे युद्ध में मारे गए।
परिणाम
खुसरो के अनुसार अलाउद्दीन के आदेश पर 30,000 लोगों को मार दिया गया। इतिहासकार बनारसी प्रसाद सक्सेना इस संख्या को बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई मानते हैं, क्योंकि फ़ारसी लिपि में "तीन" और "तीस" लगभग एक जैसे दिखते हैं। अलाउद्दीन ने किला अपने 7-8 साल के बेटे खिज्र खां को सौंपा और चित्तौड़ का नाम "खिज्राबाद" रखा। सात दिन बाद वह मंगोल आक्रमण की खबर पर दिल्ली लौट गया।
रानी पद्मिनी: इतिहास या कथा?
पहले साके को सबसे ज़्यादा लोग रानी पद्मिनी के जौहर से जानते हैं। यह कहानी मलिक मुहम्मद जायसी के काव्य "पद्मावत" (करीब 1540 ई.) से आई, जो घटना के करीब 237 साल बाद लिखा गया। खुसरो और बरनी, जो उस समय के सबसे नज़दीकी स्रोत हैं, पद्मिनी का नाम नहीं लेते।
इसलिए हरबंस मुखिया जैसे ज़्यादातर इतिहासकार पद्मिनी को साहित्यिक पात्र मानते हैं। वहीं रीमा हूजा की किताब में उद्धृत इतिहासकार श्रीवास्तव के अनुसार पद्मिनी को पाने की चाह वाली मूल कहानी में कुछ ऐतिहासिक सच्चाई हो सकती है। जौहर हुआ, यह परंपरा में दृढ़ है; इतिहासकार आर.वी. सोमानी इसे गौमुख कुंड के पास या महलों के भीतर हुआ मानते हैं। पूरी बहस रानी पद्मिनी का इतिहास में पढ़ें, और "पद्मावत" के वीर पात्रों की कहानी गोरा और बादल का इतिहास में।
चित्तौड़ का दूसरा साका (1535): बहादुरशाह और रानी कर्णावती
पृष्ठभूमि और कारण
1528 में राणा सांगा की मृत्यु के बाद मेवाड़ में कमज़ोर शासक आए। 1531 में राणा बने विक्रमादित्य अपने रूखे और घमंडी स्वभाव के कारण सरदारों में नापसंद थे, और कई सामंत दरबार छोड़ गए। गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने इसी फूट का फायदा उठाया और अपना राज्य बढ़ाने के लिए चित्तौड़ पर नज़र डाली।
घटनाक्रम
बहादुरशाह ने दिसंबर 1532 में पहली बार चित्तौड़ घेरा। तब रानी कर्णावती ने धन देकर संधि की और मार्च 1533 में गुजराती सेना लौट गई। 1534 में वह फिर आया। इस बार उसका तोपखाना, जिसकी कमान रूमी खां के हाथ थी, दीवारें तोड़ने में सफल रहा।
हार तय होने पर रानी कर्णावती ने किले की स्त्रियों के साथ जौहर किया। देवलिया (प्रतापगढ़) के रावत बाघसिंह ने केसरिया पहनकर आखिरी लड़ाई की अगुवाई की। 8 मार्च 1535 को किला बहादुरशाह के हाथ आया। कुछ हिंदी स्रोत इस साके को 1534 का लिखते हैं, क्योंकि घेरा 1534 में शुरू हुआ था।
हमले से पहले छोटे राजकुमार उदयसिंह और विक्रमादित्य को पन्नाधाय के साथ बूंदी भेज दिया गया था। यही उदयसिंह आगे चलकर एक और रात बच निकले, जिसकी कहानी पन्नाधाय का इतिहास में है।
परिणाम
बहादुरशाह चित्तौड़ पर ज़्यादा दिन नहीं टिक सका। उसके जाते ही सिसोदिया सरदारों ने किला वापस ले लिया।
हुमायूं की राखी वाली कहानी
मशहूर कहानी है कि कर्णावती ने मदद के लिए हुमायूं को राखी भेजी और हुमायूं समय पर नहीं पहुंच सका। इतिहासकार सतीश चंद्र के अनुसार यह कहानी बाद में कर्नल टॉड के ज़रिए फैली, और आधुनिक इतिहासकार इसे पक्का तथ्य नहीं मानते। कर्णावती की पूरी कहानी रानी कर्णावती का इतिहास में है।
चित्तौड़ का तीसरा साका (1567-68): अकबर, जयमल और पत्ता
पृष्ठभूमि और कारण
अकबर उत्तर भारत में मुगल सत्ता पक्की कर रहा था, और मेवाड़ अकेला बड़ा राज्य था जिसने अधीनता नहीं मानी थी। चित्तौड़ जीतना मेवाड़ को झुकाने का सबसे बड़ा प्रतीक था।
उदयसिंह ने किला क्यों छोड़ा
23 अक्टूबर 1567 को अकबर ने घेरा डाला। युद्ध परिषद की सलाह पर महाराणा उदयसिंह परिवार के साथ मेवाड़ के पश्चिमी पहाड़ी इलाके की ओर चले गए, जहां वे नई राजधानी उदयपुर बसा रहे थे। किले की कमान बदनोर के राव जयमल राठौड़ को करीब 8,000 घुड़सवारों और कुछ बंदूकचियों के साथ सौंपी गई।
इतिहास में इस फैसले की आलोचना भी हुई है और बचाव भी। एक पक्ष इसे राणा की कमज़ोरी मानता है, जबकि दूसरा पक्ष कहता है कि राजा का बचना ही आगे लड़ाई जारी रखने की शर्त थी, और यही बाद में हल्दीघाटी और दिवेर तक की लड़ाई का आधार बना।
घटनाक्रम
सीधे हमले से किला नहीं टूटा, तो अकबर ने करीब 5,000 कारीगरों, संगतराशों और बढ़इयों से "साबात" (ढकी हुई खाइयां) और सुरंगें बनवाईं। करीब 58 दिन बाद सुरंगों में बारूद से विस्फोट कर दीवार तोड़ी गई, लेकिन इसमें हमलावरों का भारी नुकसान हुआ।
22 फरवरी 1568 की रात जयमल टूटी दीवार की मरम्मत करवा रहे थे, तभी अकबर की बंदूक की गोली से उनकी मौत हो गई। कुछ लोकगाथाएं कहती हैं कि घायल जयमल अगली सुबह कल्ला राठौड़ के कंधे पर बैठकर लड़े, लेकिन गोपीनाथ शर्मा के अनुसार उस समय के राजपूत, जैन और मुगल रिकॉर्ड बताते हैं कि जयमल उसी रात मारे गए।
उसी रात किले में कई जगह जौहर हुआ। 23 फरवरी 1568, होली के दिन, राजपूतों ने दरवाज़े खोले और केलवा के 16-17 साल के पत्ता चूंडावत के नेतृत्व में आखिरी लड़ाई लड़ी। अबुल फ़ज़ल की "अकबरनामा" के अनुसार पत्ता हाथी के पैरों तले कुचले गए। जयमल और पत्ता की पूरी कहानी जयमल और फत्ता का इतिहास में है।
परिणाम
किला जीतने के बाद करीब 30,000 लोग मारे गए, जिनमें ज़्यादातर किले में शरण लिए किसान और आम लोग थे। 9 मार्च 1568 को अकबर ने एक "फतहनामा" (जीत का पत्र) जारी किया। बाद में उसने आगरा किले के बाहर जयमल और पत्ता की मूर्तियां लगवाईं। इतिहासकार इस पर बंटे हैं कि यह वीरता का सम्मान था या उन्हें द्वारपाल दिखाकर नीचा दिखाने का तरीका।
इस साके के बाद चित्तौड़ फिर कभी मेवाड़ की राजधानी नहीं बना, और राजधानी उदयपुर चली गई।
चित्तौड़गढ़ के तीन साके: तुलना और आज का महत्व
तीनों साकों में एक जैसी बात यह है कि किला ऊंचा और मज़बूत होने के बावजूद लंबे घेरे, कम होती रसद और नई युद्ध तकनीक (1535 में तोपें, 1568 में सुरंगें और बंदूकें) के आगे टिक नहीं पाया। फर्क यह है कि 1303 में दिल्ली सल्तनत लंबे समय तक किले पर रही, 1535 में किला जल्दी वापस आ गया, और 1568 के बाद मेवाड़ ने राजधानी ही बदल दी।
आज किले में कहां देखें
- जौहर स्थल: किले में एक जगह "जौहर स्थल" के रूप में दिखाई जाती है, जहां जौहर स्मृति संस्थान हर साल जौहर मेला आयोजित करता है। सटीक तिथि हर साल संस्थान घोषित करता है (यात्रा से पहले पुष्टि करें)।
- गौमुख कुंड: सोमानी के अनुसार 1303 का जौहर शायद इसी के आसपास हुआ।
- भैरों पोल की छतरियां: जयमल और कल्ला राठौड़ की याद में।
- पद्मिनी महल: 19वीं सदी में दोबारा बना, पद्मिनी की कथा से जुड़ा।
इन जगहों की पूरी जानकारी, टाइमिंग और टिकट चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास में है।
घूमने का टिप किले में साकों से जुड़ी जगहें एक क्रम में देखें: भैरों पोल (जयमल-कल्ला की छतरियां) से शुरू करें, फिर राणा कुंभा महल, गौमुख कुंड और जौहर स्थल, और आखिर में पद्मिनी महल। ऐसे घूमने पर तीनों साके जगह के साथ याद रह जाते हैं।
परीक्षा के लिए चित्तौड़गढ़ के तीन साकों से जुड़े तथ्य
- पहला साका: 1303 ई., अलाउद्दीन खिलजी, शासक रतनसिंह; जौहर की परंपरागत नायिका रानी पद्मिनी।
- 1303 के घेरे में अमीर खुसरो अलाउद्दीन के साथ थे; ग्रंथ: खज़ाइन-उल-फुतूह।
- अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद रखा और इसे खिज्र खां को सौंपा।
- दूसरा साका: 1535 ई. (कुछ स्रोतों में 1534), बहादुरशाह, शासक विक्रमादित्य; जौहर रानी कर्णावती ने, केसरिया रावत बाघसिंह (देवलिया) ने।
- तीसरा साका: 1567-68 ई., अकबर, शासक उदयसिंह; नेतृत्व जयमल राठौड़ और पत्ता चूंडावत ने।
- अकबर ने 23 अक्टूबर 1567 को घेरा डाला; किला 23 फरवरी 1568 को गिरा।
- अकबर ने आगरा किले के बाहर जयमल-पत्ता की मूर्तियां लगवाईं।
- "पद्मावत" के रचयिता मलिक मुहम्मद जायसी (करीब 1540 ई.)।
चित्तौड़गढ़ के तीन साकों पर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
चित्तौड़गढ़ में कितने साके हुए?
तीन। 1303 में अलाउद्दीन खिलजी, 1535 में बहादुरशाह और 1567-68 में अकबर के हमले के समय।
चित्तौड़ का पहला साका कब और किसके समय हुआ?
1303 ई. में, राणा रतनसिंह के शासनकाल में, जब दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने किले को घेरा।
चित्तौड़ का दूसरा साका किसके नेतृत्व में हुआ?
1535 में जौहर का नेतृत्व रानी कर्णावती ने किया और केसरिया की अगुवाई देवलिया के रावत बाघसिंह ने की। उस समय शासक विक्रमादित्य थे।
चित्तौड़ का तीसरा साका किसने लड़ा?
1568 में महाराणा उदयसिंह के सेनापति जयमल राठौड़ और पत्ता चूंडावत ने अकबर की सेना से आखिरी लड़ाई लड़ी।
साका और जौहर में क्या अंतर है?
जौहर में स्त्रियां सामूहिक अग्नि-प्रवेश करती थीं, जबकि केसरिया में पुरुष केसरिया बाना पहनकर आखिरी युद्ध करते थे। दोनों मिलकर साका कहलाते हैं।
क्या रानी पद्मिनी ने सच में जौहर किया था?
परंपरा में ऐसा माना जाता है, लेकिन पद्मिनी का नाम उस समय के लेखकों (खुसरो, बरनी) में नहीं मिलता। ज़्यादातर इतिहासकार उनकी कहानी को "पद्मावत" (1540) से आई कथा मानते हैं।
अकबर ने चित्तौड़ कब जीता?
23 फरवरी 1568 को, करीब चार महीने के घेरे के बाद।
ये भी पढ़ें
- चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास
- पन्नाधाय का इतिहास
- दिवेर का युद्ध
- हल्दीघाटी का युद्ध
- रानी पद्मिनी का इतिहास
- जयमल और फत्ता का इतिहास
- जौहर और साका क्या है
चित्तौड़गढ़ के तीन साके याद रखने का आसान तरीका है: 1303 खिलजी, 1535 बहादुरशाह, 1568 अकबर, यानी दिल्ली सल्तनत, गुजरात और मुगल। किले में जाएं तो इसी क्रम में जगहें देखें। दूसरे साके से पहले के मेवाड़, यानी राणा सांगा के दौर की कहानी राणा सांगा का इतिहास में पढ़ें।
स्रोत: रीमा हूजा, A History of Rajasthan; आर.वी. सोमानी, History of Mewar; गोपीनाथ शर्मा, Mewar and the Mughal Emperors; सतीश चंद्र, Medieval India; के.एस. लाल, History of the Khaljis; भारतकोश – साका; UNESCO – Hill Forts of Rajasthan; The Quint; राजस्थान पत्रिका (जौहर मेला)।
