महाराणा प्रताप का इतिहास: जन्म से हल्दीघाटी और चावंड तक, वो योद्धा जिसने अकबर की अधीनता कभी नहीं मानी | Maharana Pratap History in Hindi

महाराणा प्रताप का इतिहास और चेतक घोड़े पर सवार वीर राजपूत योद्धा

महाराणा प्रताप का इतिहास एक ऐसे शासक की कहानी है जिसने 25 साल तक मेवाड़ पर राज किया और इस पूरे समय में अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। उनका जन्म 9 मई 1540 को कुंभलगढ़ किले में हुआ, 1572 में वे मेवाड़ की गद्दी पर बैठे, 18 जून 1576 को हल्दीघाटी में मुगल सेना से लड़े और 19 जनवरी 1597 को चावंड में उनका निधन हुआ।

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पूरा नाममहाराणा प्रताप सिंह (राणा कीका के नाम से भी जाने जाते हैं)
जन्म9 मई 1540, ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, विक्रम संवत 1597
जन्म स्थानबादल महल, कुंभलगढ़ किला (आज का राजसमंद ज़िला)
पिता और मातामहाराणा उदयसिंह द्वितीय, रानी जयवंता बाई (सोनगरा)
राजवंशसिसोदिया (गुहिल), मेवाड़
राज्याभिषेक1572, गोगुंदा
प्रमुख युद्धहल्दीघाटी (1576), दिवेर (1582)
प्रिय घोड़ाचेतक
अंतिम राजधानीचावंड
निधन19 जनवरी 1597, चावंड
उत्तराधिकारीमहाराणा अमर सिंह प्रथम

प्रारंभिक जीवन और परिवार

महाराणा प्रताप का जन्मस्थान कुंभलगढ़ किले का बादल महल, राजस्थान

प्रताप का जन्म कुंभलगढ़ किले के बादल महल के एक छोटे से कमरे में हुआ था। राजस्थान पत्रिका के अनुसार यह कमरा साल भर बंद रहता है और सिर्फ प्रताप जयंती के दिन लोगों के लिए खोला जाता है। मेवाड़ में उनकी जयंती अंग्रेज़ी तारीख की जगह हिंदू तिथि, ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, को मनाई जाती है, इसलिए हर साल जयंती की तारीख बदलती रहती है।

एक बात ध्यान रखें: ज़्यादातर भारतीय स्रोत जन्म की तारीख 9 मई 1540 मानते हैं, जबकि कुछ अंग्रेज़ी स्रोतों में 18 मई 1540 लिखा मिलता है। परीक्षा में आम तौर पर 9 मई ही पूछा जाता है।

उनके पिता महाराणा उदयसिंह द्वितीय वही शासक थे जिन्होंने उदयपुर शहर बसाया। मां जयवंता बाई सोनगरा चौहान वंश की थीं। प्रताप उदयसिंह के सबसे बड़े बेटे थे। बचपन में उन्हें "कीका" नाम से बुलाया जाता था, और यह नाम आज भी परीक्षाओं में खूब पूछा जाता है।

उनकी मुख्य रानी अजबदे पंवार बिजोलिया की थीं, और इन्हीं के बेटे अमर सिंह आगे चलकर मेवाड़ के महाराणा बने। कहा जाता है कि प्रताप के कई विवाह हुए, पर रानियों और संतानों की संख्या अलग-अलग स्रोतों में अलग बताई गई है।

राज्याभिषेक और अकबर के दूत

1572 में उदयसिंह का निधन हुआ तो गद्दी के लिए झगड़ा खड़ा हो गया। रानी धीर बाई भटियाणी अपने बेटे जगमाल को महाराणा बनाना चाहती थीं, और कुछ स्रोतों के अनुसार खुद उदयसिंह ने जगमाल को उत्तराधिकारी चुना था। लेकिन मेवाड़ के बड़े सरदारों ने सबसे बड़े बेटे प्रताप का साथ दिया। 1572 में गोगुंदा में प्रताप का राज्याभिषेक हुआ, जिसकी तारीख कई स्रोतों में 28 फरवरी 1572 बताई जाती है। नाराज़ जगमाल अकबर की शरण में चले गए।

उस समय तक राजस्थान के ज़्यादातर बड़े राजघराने अकबर से संधि कर चुके थे, और चित्तौड़ 1568 में मुगलों के हाथ जा चुका था। अकबर चाहते थे कि मेवाड़ भी बिना लड़ाई के उनकी अधीनता मान ले। इसके लिए 1572-73 के बीच उन्होंने चार दूत प्रताप के पास भेजे:

  1. जलाल खां कोरची
  2. आमेर के कुंवर मानसिंह
  3. मानसिंह के पिता राजा भगवंतदास
  4. राजा टोडरमल

चारों खाली हाथ लौटे। प्रताप ने बातचीत तो की, पर अकबर के दरबार में खुद हाज़िर होने या अधीनता मानने से साफ इनकार कर दिया। मानसिंह के साथ भोज में अपमान वाली कहानी राजपूत ख्यातों में बहुत मशहूर है, लेकिन कई आधुनिक इतिहासकार इसे बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात मानते हैं। 1573 के आखिर तक साफ हो गया था कि अब फैसला युद्ध से होगा।

हल्दीघाटी का युद्ध (1576)

हल्दीघाटी के युद्ध 1576 में महाराणा प्रताप की राजपूत सेना और मुगल सेना का ऐतिहासिक संघर्ष

हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 को गोगुंदा से करीब 23 किलोमीटर उत्तर में अरावली की एक संकरी घाटी में लड़ा गया, जो आज राजसमंद ज़िले में है।

दोनों तरफ कौन था

मुगल सेना की कमान आमेर के मानसिंह के हाथ में थी। प्रताप की तरफ सबसे खास नाम हकीम खां सूर का है, जो शेरशाह सूरी के वंश से थे और एक मुसलमान सेनापति होकर भी मेवाड़ के लिए लड़े। उनके साथ भीम सिंह डोडिया, चित्तौड़ के वीर जयमल के बेटे रामदास राठौड़, बीदा झाला और भील सरदार राणा पूंजा अपने भील धनुर्धरों के साथ थे।

सेनाओं की संख्या पर इतिहासकार एकमत नहीं हैं। एक आम अनुमान के अनुसार प्रताप के पास करीब 3,000 घुड़सवार और 400 भील तीरंदाज़ थे, जबकि मानसिंह के साथ करीब 10,000 सैनिक थे।

युद्ध में क्या हुआ

महाराणा प्रताप के वीर घोड़े चेतक का ऐतिहासिक चित्रण और हल्दीघाटी से जुड़ी वीरगाथा

लड़ाई सूर्योदय के करीब तीन घंटे बाद शुरू हुई और तीन घंटे से ज़्यादा चली। मेवाड़ की सेना संख्या में काफी कम थी, और यह फर्क धीरे-धीरे भारी पड़ने लगा।

प्रताप घायल हुए तो बीदा झाला ने राज-छत्र (शाही छतरी) अपने सिर पर ले लिया, ताकि मुगल सैनिक उन्हें ही राणा समझें। वे करीब 350 सैनिकों के साथ दुश्मन को रोकते रहे और इसी बीच प्रताप मैदान से निकल गए। घायल चेतक ने उन्हें सुरक्षित जगह तक पहुंचाया और फिर दम तोड़ दिया। राजसमंद ज़िले के बलीचा गांव में आज भी चेतक की समाधि है।

हल्दीघाटी में जीता कौन?

यह सवाल आज भी बहस का है। ज़्यादातर इतिहासकार मानते हैं कि मैदान मुगलों के हाथ रहा, लेकिन वे न प्रताप को पकड़ सके, न मेवाड़ को झुका सके। इसलिए कई लोग इस जीत को "बेनतीजा" मानते हैं। 2017 में राजस्थान बोर्ड की दसवीं कक्षा की किताब में बदलाव करके लिखा गया कि मुगलों की जीत प्रमाणित नहीं है, क्योंकि मुगल सेना ने प्रताप का पीछा नहीं किया। इस बदलाव पर उस समय काफी विवाद हुआ।

कर्नल जेम्स टॉड ने हल्दीघाटी को "मेवाड़ की थर्मोपल्ली" कहा था, यानी कम सैनिकों का बड़ी सेना से डटकर लड़ना।

हल्दीघाटी के बाद: जंगलों से वापसी तक

हल्दीघाटी के एक हफ्ते के भीतर मानसिंह ने गोगुंदा ले लिया। सितंबर 1576 में अकबर खुद मेवाड़ आए, और कुछ समय में गोगुंदा, उदयपुर और कुंभलगढ़ मुगलों के कब्ज़े में आ गए। बाद में शाहबाज़ खां के हमलों ने भी मेवाड़ के बड़े हिस्से को दबाए रखा।

यहीं से प्रताप की असली लड़ाई शुरू हुई। अरावली के जंगलों और पहाड़ों में रहकर उन्होंने छापामार तरीके से मुगल चौकियों पर हमले जारी रखे। इस दौर में भील समुदाय उनका सबसे बड़ा सहारा बना, जो पहाड़ों के हर रास्ते को जानता था। घास की रोटी वाली मशहूर कहानी इसी कठिन समय से जुड़ी है, हालांकि उसे इतिहास से ज़्यादा लोक कथा माना जाता है।

भामाशाह का साथ

भामाशाह द्वारा महाराणा प्रताप को मेवाड़ की सेना के लिए आर्थिक सहायता देने का ऐतिहासिक दृश्य

इसी समय प्रताप के मंत्री भामाशाह, जो ओसवाल जैन व्यापारी थे, ने अपनी संपत्ति मेवाड़ के लिए दे दी। कर्नल टॉड और बाद के इतिहासकारों के अनुसार इस धन से 25,000 सैनिकों का 12 साल तक खर्च चल सकता था। भामाशाह आगे चलकर सेनापति के रूप में भी लड़े।

दिवेर का युद्ध (1582)


1579 के बाद अकबर का ध्यान बंगाल-बिहार के विद्रोहों और पंजाब की तरफ चला गया, और मेवाड़ पर दबाव कम हुआ। प्रताप ने यही मौका पकड़ा। 1582 में दिवेर की मुगल चौकी पर हमला हुआ, जिसमें कुंवर अमर सिंह ने मुगल सेनापति सुल्तान खां को मार गिराया। टॉड ने दिवेर को "मेवाड़ का मैराथन" कहा, क्योंकि यहीं से मेवाड़ की वापसी शुरू हुई।

1585 में अकबर लाहौर चले गए और करीब 12 साल वहीं रहे। इस दौरान मेवाड़ पर कोई बड़ा अभियान नहीं भेजा गया। प्रताप ने उदयपुर, मोही, गोगुंदा, मांडल और पांडवाड़ा समेत 36 मुगल चौकियां वापस ले लीं। चित्तौड़ को छोड़कर मेवाड़ का बड़ा हिस्सा फिर उनके हाथ में था।

चावंड, अंतिम दिन और निधन

1585 में प्रताप ने चावंड को अपनी नई राजधानी बनाया, जो आज उदयपुर से करीब 65 किलोमीटर दक्षिण में सराड़ा तहसील में है। यहां उन्होंने चामुंडा माता का मंदिर बनवाया। महलों के खंडहर आज भी मौजूद हैं, हालांकि उनकी देखभाल अच्छी नहीं है।

19 जनवरी 1597 को 56 साल की उम्र में चावंड में उनका निधन हुआ। बताया जाता है कि शिकार के दौरान लगी चोट इसकी वजह बनी। कहा जाता है कि उन्होंने अमर सिंह से वचन लिया था कि मुगलों के आगे न झुकें और चित्तौड़ वापस लेने की कोशिश करते रहें। चावंड से कुछ किलोमीटर दूर केजड़ झील के बीच एक टापू पर संगमरमर की छतरी बनी है, जिसे बांडोली की छतरी कहा जाता है।

प्रताप के बाद अमर सिंह ने भी कई साल संघर्ष किया, लेकिन आखिरकार 1615 में (कुछ स्रोतों में 1614) जहांगीर के साथ संधि हुई। इसमें शर्त रखी गई कि महाराणा को खुद मुगल दरबार नहीं जाना पड़ेगा, और चित्तौड़ मेवाड़ को लौटा दिया गया, लेकिन इस शर्त पर कि किले की मरम्मत नहीं होगी।

महाराणा प्रताप की विरासत और आम गलतफहमियां

प्रताप की असली पहचान किसी एक युद्ध से नहीं, बल्कि 25 साल के उस फैसले से है जिसमें उन्होंने आसान रास्ता नहीं चुना। उनकी सेना में मुसलमान सेनापति हकीम खां सूर, भील सरदार राणा पूंजा और जैन मंत्री भामाशाह एक साथ थे। यह बताता है कि उनकी लड़ाई धर्म की नहीं, मेवाड़ की आज़ादी की थी।

81 किलो का भाला: सच या कहानी?

सोशल मीडिया पर अक्सर लिखा मिलता है कि प्रताप का भाला 81 किलो और कवच 72 किलो का था, और सब हथियार मिलाकर 208 किलो। ये आंकड़े बहुत मशहूर हैं, पर इन्हें किसी समकालीन ग्रंथ या संग्रहालय के रिकॉर्ड के साथ नहीं दिया जाता। इसलिए इन्हें इतिहास से ज़्यादा लोक कथन मानकर पढ़ें।

"प्रताप हल्दीघाटी से भागे थे"

यह भी अधूरी बात है। प्रताप घायल होकर मैदान से निकले, ताकि वे ज़िंदा रहकर लड़ाई जारी रख सकें। अगले 20 साल का इतिहास बताता है कि यही फैसला मेवाड़ की वापसी की नींव बना।

महाराणा प्रताप से जुड़े प्रमुख स्थल

स्थलसंबंध
कुंभलगढ़ किला (राजसमंद)जन्म स्थान, बादल महल
गोगुंदा (उदयपुर)राज्याभिषेक
हल्दीघाटी (राजसमंद)1576 का युद्ध
बलीचा (राजसमंद)चेतक की समाधि
दिवेर (राजसमंद)1582 का युद्ध
चावंड (उदयपुर)अंतिम राजधानी, निधन स्थान
बांडोली, केजड़ झीलमहाराणा प्रताप की छतरी

घूमने का टिप अगर आप महाराणा प्रताप से जुड़ी जगहें देखना चाहते हैं, तो उदयपुर को बेस बनाइए। एक दिन में हल्दीघाटी, चेतक समाधि और कुंभलगढ़ आराम से देखे जा सकते हैं, जबकि चावंड और केजड़ झील की छतरी के लिए अलग से आधा दिन रखें।

परीक्षा के लिए महाराणा प्रताप से जुड़े तथ्य

  • जन्म: 9 मई 1540, कुंभलगढ़ (ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, वि.सं. 1597)
  • बचपन का नाम: कीका
  • माता: जयवंता बाई; पत्नी: अजबदे पंवार
  • राज्याभिषेक: 1572, गोगुंदा
  • अकबर के 4 दूत: जलाल खां कोरची, मानसिंह, भगवंतदास, टोडरमल
  • हल्दीघाटी का युद्ध: 18 जून 1576; मुगल सेनापति मानसिंह
  • प्रताप की सेना के मुस्लिम सेनापति: हकीम खां सूर
  • टॉड ने हल्दीघाटी को "मेवाड़ की थर्मोपल्ली" और दिवेर को "मेवाड़ का मैराथन" कहा
  • भामाशाह: प्रताप के मंत्री, ओसवाल जैन
  • नई राजधानी चावंड: 1585
  • निधन: 19 जनवरी 1597, चावंड; छतरी बांडोली में

महाराणा प्रताप से जुड़े सवाल

महाराणा प्रताप का जन्म कब और कहां हुआ?

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 (ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, वि.सं. 1597) को कुंभलगढ़ किले के बादल महल में हुआ था।

महाराणा प्रताप के माता-पिता कौन थे?

उनके पिता महाराणा उदयसिंह द्वितीय और माता जयवंता बाई सोनगरा थीं।

हल्दीघाटी का युद्ध कब और किसके बीच हुआ?

18 जून 1576 को महाराणा प्रताप और अकबर की सेना के बीच, जिसकी कमान आमेर के मानसिंह के पास थी।

हल्दीघाटी का युद्ध किसने जीता?

मैदान मुगलों के हाथ रहा, पर वे प्रताप को न पकड़ सके न मेवाड़ जीत सके। इसलिए कई इतिहासकार इसे बेनतीजा मानते हैं।

अकबर ने महाराणा प्रताप के पास कितने दूत भेजे?

चार: जलाल खां कोरची, मानसिंह, भगवंतदास और टोडरमल। चारों असफल रहे।

चेतक की समाधि कहां है?

राजसमंद ज़िले के बलीचा गांव में, हल्दीघाटी के पास।

महाराणा प्रताप की मृत्यु कब और कहां हुई?

19 जनवरी 1597 को चावंड में। उनकी छतरी चावंड के पास बांडोली में केजड़ झील के बीच बनी है।

दिवेर का युद्ध कब हुआ?

1582 में। इसमें कुंवर अमर सिंह ने मुगल सेनापति सुल्तान खां को मारा। टॉड ने इसे "मेवाड़ का मैराथन" कहा।

ये भी पढ़ें

महाराणा प्रताप का इतिहास पढ़ने के बाद अगर आप हल्दीघाटी जाएं, तो सिर्फ घाटी नहीं, बलीचा में चेतक की समाधि भी ज़रूर देखें। वहां खड़े होकर समझ आता है कि एक घायल घोड़े ने कितने ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर अपने सवार को बचाया होगा।

स्रोत: Wikipedia (सतीश चंद्र और रीमा हूजा की किताबों के हवाले से); राजस्थान पत्रिका; Drishti IAS; RajRAS; The Quint।

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