चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास: 3 साके, जौहर और वीरता की पूरी कहानी | Chittorgarh Fort History in Hindi

Chittorgarh Kile Ka Itihas – Rajasthan ke aitihasik kile aur Vijay Stambh ka panoramic view

23 फरवरी 1568 को, होली के दिन, चित्तौड़ के किले के दरवाज़े भीतर से खोल दिए गए थे और केसरिया पहने राजपूत योद्धा अकबर की सेना पर टूट पड़े थे। चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास ऐसे ही तीन बड़े घेरों, तीन जौहरों और करीब 800 साल तक मेवाड़ की राजधानी रहने की कहानी है। परंपरा के अनुसार इसे 7वीं सदी में मौर्य (मोरी) राजा चित्रांगद ने बनवाया, 734 ई. के आसपास बप्पा रावल ने इसे जीता, और 2013 में UNESCO ने इसे World Heritage Site घोषित किया।

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नामचित्तौड़गढ़ दुर्ग (पुराना नाम चित्रकूट)
स्थानचित्तौड़गढ़ शहर, चित्तौड़गढ़ ज़िला, राजस्थान
निर्माता (परंपरा)चित्रांगद मोरी (मौर्य), 7वीं सदी
मेवाड़ के गुहिलों का अधिकारबप्पा रावल, 728 या 734 ई.
क्षेत्रफलकरीब 700 एकड़ (लगभग 280 हेक्टेयर)
परकोटे की लंबाईकरीब 13 km
पहाड़ी की ऊंचाईमैदान से करीब 180 मीटर
मुख्य द्वार7 पोल; मुख्य द्वार राम पोल
तीन साके1303, 1535 और 1568 ई.
प्रसिद्ध स्मारकविजय स्तंभ, कीर्ति स्तंभ, राणा कुंभा महल, पद्मिनी महल, कालिका माता मंदिर, मीरा मंदिर, फतेह प्रकाश महल
UNESCO2013, "Hill Forts of Rajasthan" समूह में शामिल
देखरेखभारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), 1956 से राष्ट्रीय महत्व का स्मारक

चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास: किसने बनवाया, शुरुआत से बप्पा रावल तक

चित्तौड़ का पुराना नाम "चित्रकूट" था। परंपरा और ज़्यादातर इतिहासकारों के अनुसार इसे 7वीं सदी में मोरी (मौर्य) वंश के राजा चित्रांगद ने बसाया, और उन्हीं के नाम पर इसका नाम पड़ा। एक लोक मान्यता यह भी है कि यहां का पहला गढ़ महाभारत के भीम ने बनवाया था। इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।

8वीं सदी में बप्पा रावल ने मोरी शासक मान मोरी को हराकर किला अपने अधिकार में लिया। अलग-अलग स्रोत इसका वर्ष 728 या 734 ई. बताते हैं। इसके बाद चित्तौड़ मेवाड़ के गुहिल (आगे चलकर सिसोदिया) शासकों की राजधानी बना, और 1568 तक बना रहा।

UNESCO के अनुसार किले में 8वीं से 16वीं सदी तक के स्थापत्य के बहुत सारे अवशेष हैं। किले के भीतर करीब 65 ऐतिहासिक इमारतें गिनी जाती हैं: 4 महल, 19 बड़े मंदिर, 20 बड़े जलाशय और 4 स्मारक। कभी यहां 84 जलाशय बताए जाते थे, जिनमें से करीब 22 आज बचे हैं।

चित्तौड़गढ़ किले के प्रमुख युद्ध: तीन साके

"साका" का मतलब है वह आखिरी लड़ाई जब हार निश्चित हो और पुरुष केसरिया बाना पहनकर मरने-मारने निकल पड़ें, और स्त्रियां जौहर (सामूहिक अग्नि-प्रवेश) करें। चित्तौड़ में ऐसे तीन साके हुए। यहां छोटा परिचय है; पूरा घटनाक्रम चित्तौड़गढ़ के तीन साके वाली पोस्ट में है।

वर्षघटना
1303 ई. (पहला साका)अलाउद्दीन खिलजी का घेरा, राणा रतनसिंह के समय; 26 अगस्त 1303 को किला गिरा, नाम "खिज्राबाद" रखा गया
1535 ई. (दूसरा साका)गुजरात के बहादुरशाह का हमला, विक्रमादित्य के समय; रानी कर्णावती का जौहर, रावत बाघसिंह का केसरिया
1567-68 ई. (तीसरा साका)अकबर का घेरा, उदयसिंह के समय; जयमल-पत्ता के नेतृत्व में अंतिम युद्ध, 23 फरवरी 1568 को किला गिरा

पहला साका: 1303 और रानी पद्मिनी की कहानी

दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने 28 जनवरी 1303 को घेरा डाला और 26 अगस्त 1303 को किला जीता। उसके साथ आए कवि अमीर खुसरो ने इसका ज़िक्र किया है। अलाउद्दीन ने किला अपने बेटे खिज्र खां को सौंपकर इसका नाम "खिज्राबाद" रखा।

रानी पद्मिनी और अलाउद्दीन वाली मशहूर कहानी मलिक मुहम्मद जायसी के काव्य "पद्मावत" (लगभग 1540 ई.) से आई है। खुसरो और बरनी जैसे समकालीन लेखकों में पद्मिनी का नाम नहीं मिलता, इसलिए ज़्यादातर आधुनिक इतिहासकार इसे साहित्यिक कथा मानते हैं, जबकि कुछ इतिहासकार इसके मूल में कुछ सच्चाई मानते हैं। इस बहस पर पूरी पोस्ट रानी पद्मिनी का इतिहास में है, और उनके साथ जुड़े योद्धाओं की कहानी गोरा और बादल का इतिहास में।

दूसरा साका: 1535 और रानी कर्णावती

राणा सांगा की मृत्यु के बाद कमज़ोर हुए मेवाड़ पर गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने हमला किया। उसके तोपखाने ने दीवारें तोड़ दीं और 1535 में किला गिर गया। रानी कर्णावती ने जौहर किया और देवलिया के रावत बाघसिंह ने केसरिया पहनकर आखिरी लड़ाई की अगुवाई की। पढ़ें: रानी कर्णावती का इतिहास।

इसी दौर के बाद 1536 में बनवीर ने महल में विक्रमादित्य की हत्या की, और पन्नाधाय ने अपने बेटे की बलि देकर उदयसिंह को बचाया। यह कहानी पन्नाधाय का इतिहास में है।

तीसरा साका: 1567-68, अकबर और जयमल-पत्ता

23 अक्टूबर 1567 को अकबर ने चित्तौड़ घेरा। महाराणा उदयसिंह सरदारों की सलाह पर पहाड़ों की ओर चले गए और किले की कमान जयमल राठौड़ और पत्ता चूंडावत को सौंप गए। मुगलों ने सुरंगें (साबात) खोदकर दीवारें उड़ाईं।

22 फरवरी 1568 की रात दीवार की मरम्मत करवाते जयमल अकबर की बंदूक की गोली से घायल होकर मारे गए। उसी रात किले में जौहर हुआ, और 23 फरवरी को राजपूतों ने दरवाज़े खोलकर आखिरी लड़ाई लड़ी। जयमल-पत्ता की पूरी कहानी जयमल और फत्ता का इतिहास में पढ़ें। इस हार के बाद मेवाड़ की राजधानी हमेशा के लिए उदयपुर चली गई। आगे की लड़ाई की कहानी दिवेर का युद्ध तक जाती है।

चित्तौड़गढ़ किले की वास्तुकला और देखने लायक जगहें

किला एक लंबी पहाड़ी पर फैला है, जिसकी अधिकतम लंबाई करीब 5 km है। किले के द्वार और कई प्रमुख इमारतें 15वीं सदी में राणा कुंभा के समय की हैं, जिन्होंने किले की मज़बूती और सजावट दोनों पर काम किया। कुंभा की कहानी राणा कुंभा का इतिहास में है।

सात पोल (द्वार)

नीचे से ऊपर जाते हुए सात द्वार आते हैं: पाडन पोल, भैरों पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोड़ला पोल, लक्ष्मण पोल और राम पोल। राम पोल मुख्य द्वार है। भैरों पोल के पास जयमल और उनके साथी कल्ला राठौड़ की याद में छतरियां हैं। लोक मान्यता है कि घायल जयमल को कल्ला ने अपने कंधे पर बिठाकर लड़ाई लड़ी थी।

विजय स्तंभ

राणा कुंभा ने सारंगपुर में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर जीत की याद में यह 9 मंज़िला स्तंभ बनवाया। इसकी ऊंचाई करीब 37.2 मीटर (122 फुट) है और भीतर 157 सीढ़ियां हैं। निर्माण का समय स्रोतों में अलग-अलग मिलता है: हिंदी स्रोत आम तौर पर 1440-48 ई. बताते हैं, जबकि कुछ स्रोत 1458-68 ई. लिखते हैं।

स्तंभ भगवान विष्णु को समर्पित है और इस पर देवी-देवताओं की मूर्तियां खुदी हैं। ASI के अनुसार इसके सूत्रधार (शिल्पी) जैता और उनके बेटे नापा, पूजा और पोमा थे, जिनके नाम पांचवीं मंज़िल पर खुदे हैं। ऊपरी मंज़िल पर चित्तौड़ के शासकों की वंशावली वाली प्रशस्ति लगी थी, जिसे कवि अत्रि ने शुरू किया और उनके बेटे महेश ने पूरा किया।

कीर्ति स्तंभ

विजय स्तंभ से पुराना और छोटा, करीब 22 मीटर ऊंचा यह जैन स्तंभ 12वीं सदी के आसपास जैन व्यापारी जीजा (जीजाजी बघेरवाल) ने बनवाया था। यह पहले तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है और इस पर जैन मूर्तियां खुदी हैं।

राणा कुंभा महल

विजय स्तंभ के पास बने ये महल अब खंडहर हैं, लेकिन किले की सबसे पुरानी शाही इमारतों में गिने जाते हैं। माना जाता है कि उदयसिंह का जन्म यहीं हुआ था। शाम का लाइट एंड साउंड शो भी इसी इलाके में होता है।

पद्मिनी महल

किले के दक्षिणी हिस्से में तालाब के किनारे तीन मंज़िला सफेद महल है। आज जो इमारत दिखती है, वह 19वीं सदी में मूल महल की जगह दोबारा बनाई गई थी। लोककथा है कि अलाउद्दीन ने यहां शीशे में पद्मिनी का प्रतिबिंब देखा था, लेकिन यह कहानी "पद्मावत" की परंपरा से आई है, समकालीन इतिहास से नहीं।

कालिका माता मंदिर और मीरा मंदिर

कालिका माता मंदिर मूल रूप से 8वीं सदी का सूर्य मंदिर माना जाता है, जो 14वीं सदी में टूटने के बाद काली माता का मंदिर बना। मीरा मंदिर कुंभा के समय के मंदिर परिसर में है और भक्त कवयित्री मीराबाई से जुड़ा है। मीरा के चचेरे भाई जयमल ही 1568 में किले के रक्षक थे।

गौमुख कुंड और जौहर स्थल

चट्टान में बने गाय के मुख जैसे झरने से पानी लगातार एक कुंड में गिरता है। घेरों के समय यह किले का सबसे भरोसेमंद जल स्रोत था। इतिहासकार आर.वी. सोमानी के अनुसार 1303 का जौहर शायद गौमुख कुंड के पास या महलों के भीतर हुआ था, हालांकि सटीक जगह पक्की नहीं है। किले में एक जगह आज "जौहर स्थल" के नाम से दिखाई जाती है, जहां हर साल जौहर स्मृति संस्थान जौहर मेला आयोजित करता है।

फतेह प्रकाश महल (म्यूज़ियम)

1885 से 1930 के बीच बना यह महल अब सरकारी म्यूज़ियम है, जिसमें मूर्तियां, हथियार और पुरानी चीज़ें रखी हैं। यह किले की बाकी इमारतों से काफी नया है, इसलिए इसकी बनावट भी अलग दिखती है।

चित्तौड़गढ़ किले से जुड़ी कहानियां और रोचक तथ्य

  • राजस्थान में कहावत है: "गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया"। यानी असली किला तो चित्तौड़ है, बाकी सब छोटी गढ़ियां।
  • 1568 की जीत के बाद अकबर ने आगरा किले के बाहर जयमल और पत्ता की मूर्तियां लगवाईं। इतिहासकार इस पर बंटे हैं कि यह सम्मान था या उन्हें द्वारपाल दिखाकर नीचा दिखाने का तरीका।
  • 1568 के बाद मेवाड़ की राजधानी कभी चित्तौड़ वापस नहीं आई; उदयपुर ही आगे की राजधानी रहा।
  • हुमायूं को रानी कर्णावती की राखी वाली कहानी बहुत मशहूर है, लेकिन इतिहासकार सतीश चंद्र जैसे विद्वान इसे बाद में गढ़ी गई कहानी मानते हैं।
  • UNESCO की टीम ने किले के आसपास की खदानों, सीमेंट और ज़िंक फैक्ट्रियों से होने वाले प्रदूषण पर चिंता जताई है, क्योंकि कुछ इमारतें धीरे-धीरे कमज़ोर हो रही हैं।
क्या न करें
  • विजय स्तंभ और पुरानी दीवारों पर नाम न लिखें, मूर्तियों को न छुएं। यह ASI का संरक्षित स्मारक है।
  • खंडहर हो चुके महलों की टूटी दीवारों और किनारों पर चढ़कर फोटो न लें; कई जगह नीचे गहरी ढलान है।
  • कालिका माता और मीरा मंदिर में जूते बाहर उतारें और पूजा के समय शांति रखें।

चित्तौड़गढ़ किला घूमने की जानकारी: टाइमिंग, टिकट और कैसे पहुंचें

टाइमिंग और टिकट

किला रोज़ सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक खुलता है। भारतीय पर्यटकों का टिकट ₹40 और विदेशी पर्यटकों का ₹600 है (अगस्त 2026 तक की जानकारी, यात्रा से पहले पुष्टि करें)। टिकट ASI की वेबसाइट से ऑनलाइन भी लिया जा सकता है।

ध्यान रखें: 8 सितंबर 2026 को ASI ने टिकट वाले स्मारकों की नई सूची का ड्राफ्ट गजट में जारी किया है, जिसमें चित्तौड़गढ़ और कुंभलगढ़ को "Category A" में रखा गया है। अंतिम अधिसूचना के बाद टिकट की दर बदल सकती है, इसलिए जाने से पहले ASI की साइट या टिकट काउंटर पर ताज़ा दर देख लें।

लाइट एंड साउंड शो

शाम को किले में लाइट एंड साउंड शो होता है, जिसमें हिंदी और अंग्रेज़ी में किले की कहानी सुनाई जाती है। शो का समय मौसम के हिसाब से बदलता है और टिकट अलग लगता है (यात्रा से पहले पुष्टि करें)।

कैसे पहुंचें

  • रेल: चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन जयपुर, अजमेर, कोटा, उदयपुर और दिल्ली से जुड़ा है। स्टेशन से किले तक ऑटो या टैक्सी मिल जाती है।
  • हवाई जहाज़: सबसे पास का एयरपोर्ट उदयपुर का डबोक (महाराणा प्रताप एयरपोर्ट) है, जहां से टैक्सी लेकर चित्तौड़ आना होता है।
  • सड़क: चित्तौड़गढ़ अजमेर से करीब 185 km और जयपुर से करीब 325 km दूर है।

घूमने का टिप किला बहुत बड़ा है, पैदल पूरा देखना मुश्किल है। ऑटो या अपनी गाड़ी से किले के भीतर की सड़क पर घूमें और कम से कम 4-5 घंटे रखें। सुबह जल्दी पहुंचें तो गर्मी और भीड़ दोनों कम मिलेंगी। एक अच्छा क्रम है: राम पोल से अंदर आकर राणा कुंभा महल, फिर विजय स्तंभ, गौमुख कुंड, कालिका माता, पद्मिनी महल, कीर्ति स्तंभ, और आखिर में फतेह प्रकाश म्यूज़ियम। अक्टूबर से मार्च घूमने का सबसे अच्छा समय है।

परीक्षा के लिए चित्तौड़गढ़ किले से जुड़े तथ्य

  • चित्तौड़ का प्राचीन नाम: चित्रकूट; परंपरा के अनुसार निर्माता: चित्रांगद मौर्य (मोरी)।
  • बप्पा रावल ने मान मोरी से किला जीता (728/734 ई.)।
  • 2013 में UNESCO World Heritage Site ("Hill Forts of Rajasthan" में 6 किले); बैठक नोम पेन्ह (कंबोडिया) में हुई थी।
  • विजय स्तंभ: राणा कुंभा, सारंगपुर में महमूद खिलजी पर जीत की याद में; 9 मंज़िल, करीब 122 फुट; विष्णु को समर्पित; शिल्पी जैता।
  • कीर्ति स्तंभ: जैन व्यापारी जीजा, 12वीं सदी के आसपास, आदिनाथ को समर्पित।
  • 1303 में अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम "खिज्राबाद" रखा।
  • तीन साके: 1303 (अलाउद्दीन), 1535 (बहादुरशाह), 1568 (अकबर)।
  • मुख्य द्वार: राम पोल; कुल 7 पोल।
  • फतेह प्रकाश महल में सरकारी म्यूज़ियम है।

चित्तौड़गढ़ किले के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

चित्तौड़गढ़ का किला किसने बनवाया था?

परंपरा के अनुसार 7वीं सदी में मोरी (मौर्य) राजा चित्रांगद ने इसे बनवाया। बाद में बप्पा रावल ने इसे जीतकर मेवाड़ की राजधानी बनाया, और राणा कुंभा ने 15वीं सदी में इसे बहुत मज़बूत किया।

चित्तौड़गढ़ में कितने साके हुए?

तीन: 1303 में अलाउद्दीन खिलजी, 1535 में बहादुरशाह और 1567-68 में अकबर के हमले के समय।

चित्तौड़गढ़ किले का क्षेत्रफल कितना है?

करीब 700 एकड़ (लगभग 280 हेक्टेयर)। इसका परकोटा करीब 13 km लंबा है और किला मैदान से करीब 180 मीटर ऊंची पहाड़ी पर है।

विजय स्तंभ किसने और क्यों बनवाया?

राणा कुंभा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर सारंगपुर की जीत की याद में। यह 9 मंज़िला है और भगवान विष्णु को समर्पित है।

चित्तौड़गढ़ किले का टिकट कितना है?

भारतीयों के लिए ₹40 और विदेशियों के लिए ₹600 (अगस्त 2026 तक)। ASI की नई सूची लागू होने पर दर बदल सकती है, इसलिए जाने से पहले जांच लें।

चित्तौड़गढ़ किला घूमने में कितना समय लगता है?

मुख्य जगहें ठीक से देखने के लिए 4-5 घंटे रखें। लाइट एंड साउंड शो भी देखना हो तो शाम तक रुकें।

क्या चित्तौड़गढ़ किला भारत का सबसे बड़ा किला है?

इसे देश के सबसे बड़े किलों में गिना जाता है। UNESCO ने भी इसके आकार और इमारतों की संख्या को असाधारण माना है।

ये भी पढ़ें

चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास सिर्फ पढ़ने से पूरा नहीं होता। विजय स्तंभ की ऊपरी मंज़िलों की नक्काशी और गौमुख का बहता पानी देखकर ही समझ आता है कि यह किला 800 साल तक मेवाड़ की धड़कन क्यों रहा। जाने से पहले तीन साकों वाली पोस्ट पढ़ लें, किले की हर जगह का मतलब बदल जाएगा। राणा सांगा के समय के चित्तौड़ की कहानी आगे की पोस्ट में आएगी।

स्रोत: UNESCO – Hill Forts of Rajasthan; भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI); राजस्थान पर्यटन – चित्तौड़गढ़; रीमा हूजा, A History of Rajasthan; आर.वी. सोमानी, History of Mewar; हरबिलास शारदा, Maharana Kumbha; दैनिक नवज्योति (ASI ड्राफ्ट सूची)।

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