1582 की विजयादशमी। अरावली की एक घाटी में मेवाड़ की सेना दो टुकड़ियों में बंटकर मुगल थाने पर टूट पड़ी, एक की अगुवाई महाराणा प्रताप कर रहे थे और दूसरी की उनके बेटे कुंवर अमरसिंह। दिवेर का युद्ध राजसमंद ज़िले के दिवेर में लड़ा गया और इसमें मेवाड़ की जीत हुई। इसके बाद मेवाड़ में मुगलों के करीब 36 थाने (सैनिक चौकियां) खाली हो गए। कर्नल जेम्स टॉड ने इसे "मेवाड़ का मैराथन" कहा था।
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| युद्ध | दिवेर का युद्ध (दिवेर-छापली का युद्ध) |
| कब | 1582 ई., विजयादशमी (अक्टूबर) |
| कहां | दिवेर, राजसमंद ज़िला, राजस्थान |
| मेवाड़ पक्ष | महाराणा प्रताप, कुंवर अमरसिंह |
| मुगल पक्ष | अकबर की सेना के थानेदार और सेनापति (सुल्तान खां, बहलोल खां के नाम आते हैं) |
| परिणाम | मेवाड़ की निर्णायक जीत |
| बड़ा असर | मेवाड़ के करीब 36 मुगल थाने खत्म, चित्तौड़ छोड़कर ज़्यादातर मेवाड़ वापस |
| टॉड का नाम | "मेवाड़ का मैराथन" (हल्दीघाटी को "मेवाड़ का थर्मोपिली") |
| दूसरा दिवेर युद्ध | 1606 ई., महाराणा अमरसिंह बनाम जहांगीर की सेना |
| आज | दिवेर में विजय स्मारक बना है |
दिवेर का युद्ध क्यों हुआ: पृष्ठभूमि
दिवेर की जीत को समझने के लिए पहले हल्दीघाटी पर लौटना होगा। 18 जून 1576 को हल्दीघाटी में मुगल सेना मैदान जीत गई, पर महाराणा प्रताप को न पकड़ सकी, न मार सकी। प्रताप पहाड़ों में चले गए और वहीं से छापामार (गुरिल्ला) लड़ाई शुरू हुई।
1577 से 1580 के बीच अकबर ने मेवाड़ पर एक के बाद एक अभियान भेजे। भगवानदास, मानसिंह, शाहबाज़ खां और अब्दुर्रहीम खानखाना जैसे बड़े सेनापति आए। मुगलों ने मेवाड़ के रास्तों और कस्बों पर थाने बैठा दिए, ताकि रसद और आवाजाही उनके हाथ में रहे।
इन्हीं सालों में मेवाड़ ने अपनी ताकत फिर जुटाई। भामाशाह और ताराचंद ने मालवा के धावों से धन जुटाया और महाराणा को भेंट किया। कई विवरणों के अनुसार इसी धन से प्रताप नई सेना खड़ी कर पाए। अब इंतज़ार था सही मौके का।
दिवेर ही क्यों?
दिवेर अरावली की पहाड़ियों में, कुंभलगढ़ और देवगढ़ के बीच का इलाका है। यहां से मेवाड़ और मारवाड़ के बीच का पहाड़ी रास्ता गुज़रता था। आज यह गांव राजसमंद ज़िले में नेशनल हाईवे 48 (पुराना NH-8) के पास है। ऐसे घाटी वाले रास्ते पर बैठा मुगल थाना पूरे उत्तरी मेवाड़ पर नज़र रखता था, इसलिए उस पर हमला सबसे असरदार चोट थी।
दोनों पक्ष: किसकी सेना में कौन
मेवाड़ की ओर से महाराणा प्रताप खुद मैदान में थे। सेना को दो हिस्सों में बांटा गया, एक की कमान प्रताप के पास और दूसरी कुंवर अमरसिंह के पास, जो आगे चलकर मेवाड़ के महाराणा बने। कुछ विवरणों में भामाशाह के दिवेर पर हमलों में शामिल होने का भी ज़िक्र मिलता है।
मुगल पक्ष में दिवेर का थाना और आसपास की चौकियां थीं। मेवाड़ी विवरणों में मुगल सेनापति के रूप में सुल्तान खां का नाम आता है, जिसे कुछ हिंदी स्रोत अकबर का रिश्तेदार (चाचा) बताते हैं। एक और नाम बहलोल खां का है। इन रिश्तों और पदों की पुष्टि मुगल दस्तावेज़ों से नहीं होती, इसलिए इन्हें परंपरा से आए विवरण मानना ठीक रहेगा।
दिवेर के युद्ध का घटनाक्रम
विजयादशमी का दिन चुना गया। दशहरे पर शस्त्र पूजा की राजपूत परंपरा रही है, और इसी दिन सेना ने कूच किया। दिवेर घाटा, जिसे राणाकड़ा भी कहा जाता है, और राताखेत जैसी जगहों पर लड़ाई हुई।
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 18 जून 1576 | हल्दीघाटी का युद्ध, प्रताप पहाड़ों में, छापामार लड़ाई शुरू |
| 1577-1580 | अकबर के कई अभियान, मेवाड़ में मुगल थाने बैठाए गए |
| करीब 1578 | भामाशाह ने चूलिया गांव में महाराणा को धन भेंट किया |
| 1582 (विजयादशमी) | दिवेर पर दो तरफ से हमला, मेवाड़ की जीत |
| 1582 के बाद | मेवाड़ के मुगल थाने एक-एक कर खाली, कुंभलगढ़, गोगुंदा जैसे ठिकाने वापस |
| 19 जनवरी 1597 | चावंड में महाराणा प्रताप का निधन |
| 1606 | दिवेर का दूसरा युद्ध, महाराणा अमरसिंह की जहांगीर की सेना पर जीत |
अमरसिंह का भाला और प्रताप की तलवार: कथा और इतिहास
दिवेर से जुड़ी दो कहानियां सबसे ज़्यादा सुनाई जाती हैं। लोक मान्यता है कि कुंवर अमरसिंह ने मुगल सेनापति पर भाले से ऐसा वार किया कि भाला सेनापति और उसके घोड़े दोनों को भेदता हुआ ज़मीन में धंस गया। दूसरी कहानी में महाराणा प्रताप ने बहलोल खां पर तलवार चलाई और एक ही वार में सवार और घोड़ा दोनों कट गए।
ये कहानियां मेवाड़ की वीर-परंपरा और चित्रों में गहराई से बसी हैं। पर इन्हें शब्दशः इतिहास मानने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि इनके ब्योरे बाद के लेखकों और लोक-परंपरा से आए हैं। कई आधुनिक लेखक भी मानते हैं कि लड़ाई और सेनापति की मौत सच है, पर वार के ब्योरे समय के साथ बढ़ा-चढ़ाकर कहे गए हैं।
एक और उलझन है: सुल्तान खां को मारने वाली लड़ाई कुछ स्रोतों में 1582 की है, तो कुछ उसे 1606 के दूसरे दिवेर युद्ध से जोड़ते हैं, जब महाराणा अमरसिंह ने जहांगीर की भेजी सेना के सेनापति सुल्तान खां को मारा था। दोनों युद्ध एक ही जगह हुए और दोनों में अमरसिंह थे, इसलिए कहानियां आपस में मिल गई लगती हैं।
दिवेर के युद्ध का परिणाम और महत्व
युद्ध में मेवाड़ की साफ जीत हुई। मेवाड़ी परंपरा के मुताबिक भागती मुगल सेना का पीछा अजमेर तक किया गया। कुछ विवरण करीब 36,000 मुगल सैनिकों के आत्मसमर्पण की बात भी कहते हैं, पर इतनी बड़ी संख्या की पुष्टि समकालीन मुगल दस्तावेज़ों से नहीं होती।
सबसे बड़ा और ठोस असर यह था कि मेवाड़ में बैठे मुगल थाने एक के बाद एक खाली हो गए। ज़्यादातर स्रोत यह संख्या 36 बताते हैं, कुछ 32। इसके बाद के सालों में कुंभलगढ़, गोगुंदा, उदयपुर जैसे ठिकाने मेवाड़ के पास लौट आए। चित्तौड़ को छोड़कर मेवाड़ का ज़्यादातर हिस्सा फिर महाराणा के अधीन था, और चावंड उनकी राजधानी बनी।
हल्दीघाटी बनाम दिवेर
हल्दीघाटी की लड़ाई में मुगल मैदान जीत गए थे, पर मकसद (प्रताप को पकड़ना) पूरा नहीं हुआ। दिवेर में उलटा हुआ: मेवाड़ ने मैदान भी जीता और उसके बाद इलाका भी। इसी वजह से टॉड ने हल्दीघाटी को यूनान के थर्मोपिली (जहां वीरों ने बड़ी सेना के सामने बलिदान दिया) से और दिवेर को मैराथन (जहां छोटी सेना ने बड़ी सेना को हराया) से जोड़ा।
इतिहासकार क्या कहते हैं
दिवेर का युद्ध मेवाड़ी स्रोतों, लोक-परंपरा और टॉड की किताब में बड़ा मोड़ है, जबकि मुगल पक्ष के ग्रंथों में इसका ज़िक्र उतना बड़ा नहीं मिलता। कुछ आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि मेवाड़ के थाने 1585 के आसपास वापस आए, जब मेवाड़ पर मुगलों का दबाव ढीला पड़ गया था। दोनों बातें मिलाकर देखें तो दिवेर की जीत ने शुरुआत की और बदली हुई परिस्थितियों ने उसे पक्का कर दिया।
दिवेर का दूसरा युद्ध (1606)
प्रताप के निधन के बाद महाराणा अमरसिंह प्रथम ने लड़ाई जारी रखी। जहांगीर ने शहज़ादे परवेज़ और आसफ खां के साथ बड़ी सेना मेवाड़ भेजी। 1606 में दिवेर के आसपास ही अमरसिंह की सेना ने इसे रोका, मुगल सेनापति सुल्तान खां मारा गया और मुगल सेना अजमेर की ओर लौट गई। परीक्षाओं में कभी-कभी यह फर्क पूछा जाता है, इसलिए दोनों तारीखें अलग याद रखें।
आज का दिवेर: विजय स्मारक और कैसे पहुंचें
दिवेर आज राजसमंद ज़िले का एक गांव है। यहां महाराणा प्रताप की जीत की याद में विजय स्मारक बना है।
दिवेर तक सड़क से जाना सबसे आसान है। उदयपुर या राजसमंद से टैक्सी या अपनी गाड़ी लेकर नेशनल हाईवे 48 के रास्ते पहुंचा जा सकता है।
घूमने का टिप अगर आप महाराणा प्रताप से जुड़ी जगहें देखना चाहते हैं, तो एक ट्रिप में हल्दीघाटी (रक्त तलाई, चेतक समाधि), कुंभलगढ़ और दिवेर को जोड़ सकते हैं। ये तीनों राजसमंद ज़िले में हैं। स्मारक खुले में है, इसलिए गर्मियों की दोपहर से बचें और अक्टूबर से फरवरी के बीच जाएं।
परीक्षा के लिए दिवेर के युद्ध से जुड़े तथ्य
- दिवेर का युद्ध: 1582 ई., विजयादशमी के दिन
- स्थान: दिवेर, राजसमंद ज़िला (दिवेर-छापली का युद्ध भी कहते हैं)
- मेवाड़ पक्ष: महाराणा प्रताप और कुंवर अमरसिंह, सेना दो टुकड़ियों में
- परिणाम: मेवाड़ की जीत, मेवाड़ के 36 मुगल थाने खत्म (कुछ स्रोत 32)
- कर्नल जेम्स टॉड: दिवेर को "मेवाड़ का मैराथन" और हल्दीघाटी को "मेवाड़ का थर्मोपिली" कहा
- दिवेर का दूसरा युद्ध: 1606, महाराणा अमरसिंह बनाम जहांगीर की सेना (सुल्तान खां मारा गया)
- प्रताप की नई राजधानी: चावंड, जहां 19 जनवरी 1597 को उनका निधन हुआ
दिवेर के युद्ध से जुड़े सवाल (FAQ)
दिवेर का युद्ध कब हुआ था?
दिवेर का युद्ध 1582 में विजयादशमी (दशहरे) के दिन, अक्टूबर महीने में हुआ था। इसका दूसरा युद्ध 1606 में महाराणा अमरसिंह के समय हुआ।
दिवेर का युद्ध किसके बीच हुआ?
यह युद्ध महाराणा प्रताप और कुंवर अमरसिंह के नेतृत्व वाली मेवाड़ की सेना और अकबर की मुगल सेना के दिवेर थाने के बीच हुआ।
दिवेर कहां है?
दिवेर राजस्थान के राजसमंद ज़िले में अरावली की पहाड़ियों में है। गांव नेशनल हाईवे 48 के पास है और यहां विजय स्मारक बना है।
दिवेर के युद्ध में कौन जीता?
मेवाड़ की सेना जीती। इसके बाद मेवाड़ में बैठे करीब 36 मुगल थाने खाली हो गए और चित्तौड़ छोड़कर ज़्यादातर मेवाड़ महाराणा प्रताप के पास लौट आया।
दिवेर को "मेवाड़ का मैराथन" किसने कहा?
कर्नल जेम्स टॉड ने। उन्होंने हल्दीघाटी को "मेवाड़ का थर्मोपिली" और दिवेर को "मेवाड़ का मैराथन" कहा।
दिवेर के युद्ध में सुल्तान खां को किसने मारा?
परंपरा के अनुसार कुंवर अमरसिंह ने भाले से मुगल सेनापति को मारा। कुछ स्रोत सुल्तान खां की मौत को 1606 के दूसरे दिवेर युद्ध से जोड़ते हैं, जब अमरसिंह महाराणा बन चुके थे।
दिवेर के युद्ध का महत्व क्या है?
हल्दीघाटी के बाद यह पहली बड़ी खुली जीत थी जिसने मेवाड़ में मुगल चौकियों का जाल तोड़ दिया और प्रताप को अपना ज़्यादातर राज्य वापस दिलाया।
दिवेर का युद्ध पढ़ने के बाद हल्दीघाटी और भामाशाह की कहानी साथ में पढ़ें, तभी पूरी तस्वीर बनती है कि 1576 की हार से 1582 की जीत तक मेवाड़ कैसे पहुंचा। और अगर कुंभलगढ़ जा रहे हैं, तो दिवेर के विजय स्मारक को उसी ट्रिप में जोड़ लें।
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स्रोत: RajRAS (दिवेर का युद्ध 1582), RajRAS (दिवेर का दूसरा युद्ध 1606), RajRAS (राजसमंद ज़िला), भारतकोश, Vajiram and Ravi, Wikipedia (Dewair, राजस्थान डिस्ट्रिक्ट गजेटियर राजसमंद के संदर्भ के साथ)
