गोरा और बादल का इतिहास कथा, काव्य और स्मृति में मिलता है, किसी समकालीन दस्तावेज़ में नहीं। मान्यता है कि अलाउद्दीन खिलजी की कैद से राजा रतनसेन को पालकियों में छिपे योद्धाओं की मदद से छुड़ाने वाले ये दो राजपूत थे। जेम्स टॉड के अनुसार गोरा चाचा थे और बादल उनके किशोर भतीजे। दोनों के नाम सबसे पहले जायसी के "पद्मावत" (1540) और हेमरतन की चौपाई (करीब 1589) में दर्ज मिलते हैं।
रानी पद्मिनी की कथा रानी पद्मिनी का इतिहास वाली पोस्ट में खुली है। यहां ध्यान सिर्फ़ इन दो योद्धाओं पर है: ग्रंथ-दर-ग्रंथ वे कैसे बदलते हैं, टॉड ने उनके बारे में क्या लिखा, और चित्तौड़ किले में उनके नाम पर आज क्या खड़ा है।
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गोरा और बादल एक नज़र में
| नाम | गोरा और बादल |
| रिश्ता | चाचा और भतीजा (टॉड के अनुसार गोरा चाचा और बादल भतीजा) |
| किसकी सेवा में | चित्तौड़ के राजा रतनसेन (रत्नसिंह), कथा के अनुसार |
| कुल की पहचान | आधुनिक विवरणों में जालौर के सोनगरा चौहान; टॉड के अनुसार पद्मिनी के सिंहल वाले कुल के |
| सबसे प्रसिद्ध प्रसंग | पालकियों में योद्धा छिपाकर राजा को शत्रु की कैद से छुड़ाना |
| पहले लिखित रूप | जायसी, "पद्मावत" (1540); हेमरतन, "गोरा बादल पद्मिनी चौपाई" (करीब 1589) |
| स्मारक | चित्तौड़गढ़ किले में "गोरा बादल का गुंबज", पद्मिनी महल के दक्षिण में |
| जिला | चित्तौड़गढ़ |
गोरा और बादल का इतिहास: कौन थे दोनों
पहली बात साफ़ रहनी चाहिए: अलाउद्दीन के दौर के खुसरो, बरनी या इसामी में इन दोनों का नाम नहीं मिलता। इनकी पहचान लिखित रूप में 16वीं सदी के बाद के ग्रंथों से बनती है, और हर ग्रंथ में इनका परिचय थोड़ा अलग है।
| ग्रंथ | समय | गोरा-बादल का रूप |
|---|---|---|
| जायसी, "पद्मावत" | 1540 | रतनसेन के स्वामिभक्त सामंत। अलाउद्दीन को किले में बुलाने के खिलाफ़ सलाह देते हैं। राजा के बंदी होने पर उन्हें छुड़ाने निकलते हैं, गोरा मारा जाता है और बादल राजा को चित्तौड़ ले आता है। |
| हेमरतन, "गोरा बादल पद्मिनी चौपाई" | करीब 1589 | रचना के केंद्र में वही दोनों हैं। पालकी की योजना उन्हीं की है। राजपूत संरक्षकों के लिए लिखी गई मानी जाती है, जिसमें सामंतों की वीरता पर ज़ोर है। |
| जटमल, "गोरा बादल की कथा" (गोराबादल री बात) | 1623 या 1628 | करीब 150 पद्यों की रचना, जिसका मकसद अलाउद्दीन के हमले में गोरा-बादल की वीरता दिखाना है। इसमें रतनसेन को चौहान बताने जैसी ऐतिहासिक भूलें मानी जाती हैं। |
| जेम्स टॉड, "एनल्स" | 1829-32 | दोनों पद्मिनी के सिंहल वाले कुल के। गोरा चाचा, बादल उनका भतीजा, लगभग बारह साल का किशोर। |
आधुनिक संदर्भ-विवरणों में इन्हें जालौर के सोनगरा चौहान वंश का बताया जाता है। टॉड के विवरण से यह अलग है, इसलिए दोनों बातें साथ रखकर पढ़ें। परिवार, जन्म या बचपन के बारे में किसी भरोसेमंद लिखित स्रोत में कुछ नहीं मिलता।
पालकी वाली योजना: कथा क्या कहती है
नीचे का हिस्सा लोक मान्यता और काव्य-परंपरा है। इतिहास में इसका प्रमाण नहीं मिलता।
कथा के अनुसार अलाउद्दीन ने छल से रतनसेन (टॉड में भीमसी) को कैद कर लिया। राजा को छुड़ाने के लिए ऐसी योजना बनी जिसमें रानी की मर्यादा भी बनी रहे। पालकियां शत्रु के शिविर में भेजी गईं और हर पालकी में हथियारबंद योद्धा छिपा था।
टॉड की गिनती सात सौ ढकी पालकियों की है, और हर पालकी को उठाने वाले कहार असल में सैनिक थे। जायसी के काव्य में योद्धा पद्मावती और उसकी सखियों के वेश में शत्रु तक पहुंचते हैं। कुछ संदर्भों में पालकियां पचास बताई गई हैं, और 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान बोर्ड की कक्षा 12 की किताब में पालकियों में छिपे सैनिकों की संख्या 1,600 है। संख्या का इतना अंतर खुद बताता है कि कथा लोक में कितनी बदली।
जटमल की रचना का एक अलग पक्ष है। उसमें रतनसेन जोगी का भेस बनाता है और जान बचाने के लिए पद्मिनी को सौंपने को तैयार हो जाता है, जिसकी कवि निंदा करता है। यानी कथा के कुछ रूपों में असली नायक राजा नहीं, उसके दोनों सरदार हैं।
वीरगति और "आधा साका"
टॉड के वृत्तांत में राजा को पालकी में बिठाकर किले की ओर रवाना कर दिया जाता है और पालकियों में छिपे योद्धा पीछे से आती सेना को रोके रखते हैं। गोरा और बादल चुने हुए वीरों के साथ बाहरी द्वार पर शत्रु से टकराते हैं। गोरा इसी लड़ाई में खेत रहते हैं, और घायल बादल जीवित बच निकलता है।
टॉड ने एक मार्मिक प्रसंग भी दर्ज किया है। गोरा की पत्नी ने बादल से पूछा कि उसके पति ने युद्ध में कैसे वीरता दिखाई। बादल के बताने पर वह मुस्कुराई और पति के पास जाने के लिए चिता में प्रवेश कर गई।
टॉड ने चित्तौड़ के पतन को "साढ़े तीन साके" की तरह गिना है और इस लड़ाई को उसमें आधा साका कहा है, क्योंकि शहर पर धावा नहीं हुआ पर किले के सबसे बहादुर लोग कट गए। बाद में अलाउद्दीन ने फिर घेरा डाला और अंत में जौहर और अंतिम साका हुआ। राजस्थान की परंपरा में आम तौर पर चित्तौड़ के तीन साके गिने जाते हैं, जिनका क्रम चित्तौड़गढ़ के तीन साके में है।
इतिहास की कसौटी पर गोरा-बादल
विजयदेव नारायण साही, प्रो. कानूनगो के मत का समर्थन करते हुए, गोरा-बादल की पूरी कथा को जायसी की कल्पना मानते हैं। माता प्रसाद गुप्त का मत है कि यह जायसी से पहले की लोककथा रही होगी। यानी विद्वान इसे इतिहास नहीं, काव्य और लोक-परंपरा की देन मानते हैं।
दो तथ्य इस बहस को दिलचस्प बनाते हैं। पहला, उदयपुर के एक अभिलेख में 1488 में मालवा के सुलतान ग़ियासुद्दीन खिलजी की बादल-गोरा नाम के एक राजपूत सरदार के हाथों हार दर्ज है। अज़ीज़ अहमद का तर्क है कि जायसी ने इस घटना को अलाउद्दीन की कथा में मिला दिया होगा। दूसरा, पालकियों में सैनिक छिपाने की चाल जायसी के समकालीन शेरशाह सूरी ने 1537 में रोहतास किला लेने में अपनाई थी। इसलिए इतिहासकार मानते हैं कि कथा में अपने समय के अनुभव घुल गए।
इससे यह नहीं निकलता कि गोरा-बादल का नाम बेमानी है। राजस्थान की लोक-स्मृति में वे वीरता और स्वामिभक्ति के प्रतीक हैं, और यही उनके असली मायने हैं।
चित्तौड़गढ़ में गोरा-बादल का गुंबज
किले में पद्मिनी महल के दक्षिण में दो गुंबद के आकार के भवन हैं, जिन्हें गोरा-बादल के महल या गुंबज के नाम से जाना जाता है। IGNCA के दस्तावेज़ीकरण में "गोरा बादल का गुंबज" के रूप में दर्ज यह ढांचा पत्थर का एक मंज़िला भवन है, जिसका काल 17वीं सदी बताया गया है, यानी यह कथा के समय का नहीं। रिकॉर्ड में इसकी हालत जर्जर लिखी है और परिसर के पास पत्थर बिखरे बताए गए हैं।
घूमने का टिप गुंबज को पद्मिनी महल के साथ ही देख लें, क्योंकि दोनों एक ही हिस्से में हैं। यह स्मारक बहुत सजा हुआ नहीं है, इसलिए यहां कथा की पृष्ठभूमि पहले से पढ़कर जाएं। किले में प्रवेश और समय की पुष्टि यात्रा से पहले करें। पद्मिनी महल के लिए इंक्रेडिबल इंडिया सूर्योदय से सूर्यास्त का समय बताता है।
परीक्षा के लिए गोरा-बादल से जुड़े तथ्य
- गोरा और बादल चाचा-भतीजे थे; टॉड के अनुसार बादल लगभग बारह साल का था।
- उनका नाम जायसी के "पद्मावत" (1540) और हेमरतन की "गोरा बादल पद्मिनी चौपाई" (करीब 1589) में मिलता है।
- जटमल की "गोराबादल री बात" 1623 या 1628 की रचना है।
- खुसरो, बरनी और इसामी में इनका उल्लेख नहीं।
- टॉड ने उनकी लड़ाई को चित्तौड़ के "साढ़े तीन साकों" में आधा साका कहा।
- उदयपुर के 1488 के अभिलेख में बादल-गोरा सरदार द्वारा ग़ियासुद्दीन की पराजय दर्ज है।
- चित्तौड़गढ़ किले में "गोरा बादल का गुंबज" पद्मिनी महल के दक्षिण में है।
गोरा और बादल से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गोरा और बादल कौन थे?
चित्तौड़ के राजा रतनसेन के वफ़ादार राजपूत योद्धा, जो कथा के अनुसार चाचा और भतीजा थे। उन्हें पालकी वाली योजना से राजा को कैद से छुड़ाने के लिए जाना जाता है।
गोरा और बादल का रिश्ता क्या था?
टॉड के अनुसार गोरा चाचा थे और बादल उनके भतीजे। कुछ आधुनिक संदर्भ दोनों को जालौर के सोनगरा चौहान बताते हैं।
गोरा और बादल की मृत्यु कैसे हुई?
जायसी और टॉड दोनों में गोरा राजा को बचाने की लड़ाई में मारे जाते हैं। टॉड में घायल बादल बच जाता है; जायसी में भी बादल ही राजा को चित्तौड़ पहुंचाता है।
क्या गोरा-बादल ऐतिहासिक पात्र थे?
किसी समकालीन स्रोत में उनका नाम नहीं है। विद्वान उन्हें लोककथा या काव्य की रचना मानते हैं, और 1488 के अभिलेख वाले बादल-गोरा सरदार से इनका संबंध जोड़ते हैं।
गोरा बादल की पालकी में कितने योद्धा थे?
स्रोत अलग हैं। टॉड सात सौ पालकियां बताते हैं, कुछ संदर्भ पचास, और 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान बोर्ड की किताब 1,600 सैनिक बताती है।
चित्तौड़गढ़ में गोरा-बादल का स्मारक कहां है?
किले के भीतर पद्मिनी महल के दक्षिण में "गोरा बादल का गुंबज" है, जिसका काल 17वीं सदी बताया गया है।
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गोरा और बादल का इतिहास पढ़ने का सही तरीका यही है कि कथा की वीरता को याद रखा जाए और साथ में यह भी कि उसके सबूत 1540 के बाद के ग्रंथों में मिलते हैं। चित्तौड़ की इसी धरती से जुड़ी बाकी पोस्ट चित्तौड़गढ़ के लेबल पेज पर हैं, और अगली पोस्ट 1568 के साके के नायक जयमल और फत्ता पर है।
स्रोत: जेम्स टॉड, Annals and Antiquities of Rajast'han; INFLIBNET, पद्मावत: ऐतिहासिकता और महाकाव्यत्व; Scroll, The epic poem Padmavat is fiction; Scroll, Padmini across texts; भारतकोश, गोराबादल री बात; IGNCA, Gora Badal Ka Gumbaj; इंक्रेडिबल इंडिया; The Daily Star।
