रानी पद्मिनी का इतिहास: इतिहास और किंवदंती में क्या सच, क्या कहानी? | Rani Padmini History in Hindi

रानी पद्मिनी का इतिहास और चित्तौड़गढ़ किले का दृश्य, राजपूत रानी की ऐतिहासिक पोशाक में तस्वीर

रानी पद्मिनी का इतिहास दो परतों में पढ़ना पड़ता है। 1303 में अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ का किला जीता, यह पक्का इतिहास है। पद्मिनी को इसकी वजह बताने वाली कथा सबसे पहले मलिक मुहम्मद जायसी के "पद्मावत" (1540) में मिलती है, यानी घटना के करीब 237 साल बाद। घेरे के समय अलाउद्दीन के साथ मौजूद अमीर खुसरो अपनी रचनाओं में उनका नाम नहीं लेते।

इसलिए नीचे तीन चीज़ें अलग-अलग रखी गई हैं: जो स्रोतों में दर्ज है, जो कथा के रूप में चलती है, और जो आज चित्तौड़गढ़ किले में पद्मिनी महल के नाम से दिखता है। जहां इतिहासकार एकमत नहीं हैं, वहां दोनों बातें लिखी हैं।

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पद्मिनी एक नज़र में

नामरानी पद्मिनी (जायसी के काव्य में पद्मावती)
किससे जुड़ी हैंचित्तौड़ के राजा रतनसिंह (रत्नसिंह) की रानी, कथा के अनुसार। टॉड के वृत्तांत में पति का नाम भीमसी है।
स्थानचित्तौड़गढ़ का किला, चित्तौड़गढ़ ज़िला
जुड़ी हुई घटनाअलाउद्दीन खिलजी का चित्तौड़ पर घेरा, 28 जनवरी 1303 से 26 अगस्त 1303 तक (कुछ लेखक अंतिम तारीख 25 अगस्त देते हैं)
कथा का सबसे पुराना लिखित रूपजायसी, "पद्मावत", 1540, अवधी भाषा
समय के इतिहासकारों में नामअमीर खुसरो, बरनी और इसामी में उल्लेख नहीं
आज का स्मारकपद्मिनी महल, चित्तौड़गढ़ किला
विश्व धरोहरचित्तौड़गढ़ किला "हिल फोर्ट्स ऑफ राजस्थान" के तहत 2013 से UNESCO सूची में

रानी पद्मिनी का इतिहास: सबसे पुराने स्रोत क्या कहते हैं

किसी भी कथा की उम्र जानने का सबसे सीधा तरीका है यह देखना कि उसका नाम पहली बार कब और किसकी कलम से आया। पद्मिनी के मामले में यही तालिका पूरे विवाद की जड़ दिखा देती है।

स्रोतसमयपद्मिनी के बारे में क्या मिलता है
अमीर खुसरो, "खज़ाइन-उल-फ़ुतूह"घेरे के कुछ बरस बाद, लेखक खुद अभियान में साथ थाचित्तौड़ की चढ़ाई का ब्योरा है, पद्मिनी का नाम नहीं। कुछ विद्वान एक हुदहुद पक्षी वाले प्रसंग में हल्का इशारा पढ़ते हैं, कई इसे नहीं मानते।
कुंभलगढ़ प्रशस्ति1460घेरे का सबसे पुराना हिंदू अभिलेख। दशरथ शर्मा ने इसी के सहारे रतनसेन को ऐतिहासिक पात्र माना।
मलिक मुहम्मद जायसी, "पद्मावत"1540पहली बार पद्मावती की पूरी कथा: सिंहल की राजकुमारी, तोता हीरामन, राघव चेतन, गोरा-बादल।
हेमरतन, "गोरा बादल पद्मिनी चौपाई"करीब 1589राजस्थान में लिखा गया पहला काव्य रूप, जिसमें गोरा और बादल की वीरता केंद्र में है।
फ़रिश्ता16वीं सदी का अंतकथा को इतिहास की तरह लिखा, पर जायसी से अलग: पद्मिनी यहां रतनसेन की पत्नी नहीं, बेटी है।
जेम्स टॉड, "एनल्स एंड एंटीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान"1829-32पद्मिनी सिंहल के चौहान राजा हमीर संक की बेटी और भीमसी की पत्नी।

ध्यान देने की बात है कि खुसरो, बरनी और इसामी, यानी अलाउद्दीन के दौर के तीनों बड़े फ़ारसी लेखक, चित्तौड़ पर हमले का ज़िक्र करते हैं पर पद्मिनी का नहीं। जायसी की रचना में दर्ज बातें पहले की कथा-परंपरा से भी आ सकती हैं। रामवल्लभ सोमानी ने 1526 की "चित्तई चरित" जैसे पुराने ग्रंथों का हवाला देकर यही तर्क दिया है।

1303 का घेरा: जो इतिहास में दर्ज है

अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने 28 जनवरी 1303 को चित्तौड़ को घेरा और घेरा करीब आठ महीने चला। किला 26 अगस्त 1303 को उसके हाथ आया। रतनसिंह उससे कुछ साल पहले, लगभग 1301 में गद्दी पर बैठे थे, हालांकि कुछ लेखक उनका राज्यारोहण 1302 के अंत में बताते हैं।

रतनसिंह का अंत कैसे हुआ, इस पर स्रोत एकमत नहीं हैं। मुहणोत नैणसी की ख्यात उन्हें युद्ध में मरा बताती है, जबकि जायसी के काव्य में वे कुंभलनेर के राजा देवपाल से द्वंद्व में मारे जाते हैं। 1460 की कुंभलगढ़ प्रशस्ति में रतनसेन के लिए "चले जाने" जैसा वर्णन है, जिसे विजयदेव नारायण साही कायरता का संकेत मानते हैं, जबकि जायसी का रतनसेन बहादुर है।

जौहर पर भी मतभेद है। बनारसी प्रसाद सक्सेना का तर्क है कि खुसरो ने जौहर का ज़िक्र सिर्फ़ रणथंभौर के संदर्भ में किया है, चित्तौड़ के लिए नहीं। दूसरी तरफ़ कई लेखक 1303 में राजपूत स्त्रियों के जौहर को स्वीकार करते हैं। जौहर की जगह की कोई पक्की पहचान नहीं है। चित्तौड़ के तीनों बड़े साकों का क्रम समझना हो तो चित्तौड़गढ़ के तीन साके वाली पोस्ट में है।

कथा के चार रूप: लोक मान्यता, इतिहास नहीं

जो आगे लिखा है, वह कथा-परंपरा है। हर लेखक ने इसे अपने समय और अपने संरक्षकों के हिसाब से ढाला, इसलिए चारों रूप आपस में मेल नहीं खाते।

जायसी का पद्मावत (1540)

जायसी की कथा में सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मावती के पास हीरामन नाम का तोता है। वह तोता चित्तौड़ के राजा रतनसेन तक पहुंचता है और पद्मावती का रूप बखानता है। रतनसेन सिंहल जाकर उसे ब्याह लाते हैं। चित्तौड़ से निकाला गया ब्राह्मण राघव चेतन दिल्ली जाकर अलाउद्दीन को पद्मावती के रूप की बात बताता है।

अलाउद्दीन घेरा डालता है, छल से रतनसेन को पकड़ लेता है, और गोरा-बादल उन्हें छुड़ा लाते हैं, पर गोरा मारे जाते हैं। आगे देवपाल से द्वंद्व में रतनसेन की मृत्यु होती है, पद्मावती और पहली रानी नागमती जौहर करती हैं, और अलाउद्दीन को खाली किला मिलता है।

साहित्य के आलोचकों के अनुसार जायसी का मकसद इतिहास लिखना नहीं था। किशोरी सरन लाल जैसे विद्वान इसे रूपक मानते हैं: चित्तौड़ शरीर, रतनसेन मन, सिंहल हृदय, पद्मावती बुद्धि और अलाउद्दीन माया या वासना का प्रतीक है।

हेमरतन की चौपाई (करीब 1589)

जायसी के लगभग आधी सदी बाद लिखी इस रचना को स्थानीय राजपूत संरक्षकों का समर्थन माना जाता है। इसमें स्वामिभक्त सामंतों की वीरता पर ज़ोर है, और गोरा-बादल कथा के असली नायक बन जाते हैं। इन दोनों की कहानी हम गोरा और बादल का इतिहास वाली अगली पोस्ट में अलग से देख रहे हैं।

फ़रिश्ता का रूप

फ़ारसी इतिहासकार फ़रिश्ता ने कथा को इतिहास में गिना, पर उसकी पद्मिनी रतनसेन की बेटी है, जो अरावली की तरफ़ बच निकलती है और बाद में पिता को छुड़ाने की युक्ति सुझाती है। जायसी की पद्मावती से यह बहुत अलग तस्वीर है।

टॉड का वृत्तांत (1829)

जेम्स टॉड ने चारणों की परंपरा और पांडुलिपियों के आधार पर कथा को मेवाड़ के इतिहास में जोड़ दिया। उनके अनुसार पद्मिनी सिंहल के चौहान राजा हमीर संक की बेटी थीं और उनके पति भीमसी, नाबालिग राजकुमार लखमसी के चाचा और संरक्षक थे। गोरा और बादल ने सात सौ ढकी पालकियां शत्रु के शिविर में भेजीं, जिनमें से हर एक में हथियारबंद राजपूत था और छह-छह कहारों के वेश में सैनिक उसे उठाए हुए थे। बाद में पद्मिनी हज़ारों स्त्रियों के साथ भूमिगत कक्षों में गईं, जिन्हें बंद कर आग लगा दी गई।

टॉड की अपनी तारीखें भी उलझी हैं। वे दूसरे घेरे को संवत 1346 (1290 ई.) में रखते हैं और खुद मानते हैं कि फ़रिश्ता इसे तेरह साल बाद का बताता है, जबकि चित्तौड़ का पतन उन्होंने 1303 में लिखा है। आधुनिक आलोचक यह भी कहते हैं कि टॉड ने कथा को हिंदू-मुसलमान टकराव की तरह पेश किया, जो जायसी और हेमरतन में नहीं है। 1858 के बाद बंगाल के लेखकों ने टॉड को आधार बनाकर पद्मिनी को देशभक्ति के प्रतीक के रूप में गढ़ा।

इतिहासकार क्या कहते हैं

जो कथा के कुछ हिस्से को ऐतिहासिक मानते हैं

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने "पद्मावत" की कथा के दो हिस्से किए। रतनसेन की सिंहल यात्रा से चित्तौड़ लौटने तक का पूर्वार्द्ध उनके अनुसार कल्पना है, और राघव चेतन के निष्कासन से जौहर तक का उत्तरार्द्ध ऐतिहासिक आधार पर टिका है। प्रमाण में वे टॉड और अबुल फ़ज़ल के "आईने अकबरी" का नाम लेते हैं। रामपूजन तिवारी भी पद्मावती और उसके जौहर को ऐतिहासिक मानते हैं, पर टॉड के विवरण में कई असंगतियां भी गिनाते हैं।

जो इसे बाद की रचना मानते हैं

विजयदेव नारायण साही टॉड की राजस्थानी गाथा को इतिहास नहीं मानते। उनका तर्क है कि पहले के फ़ारसी इतिहासकारों में नाम नहीं मिलता और फ़रिश्ता जायसी के बाद का लेखक है। माता प्रसाद गुप्त यह तो मानते हैं कि कथा जायसी से पहले की लोककथा है, पर उसे इतिहास नहीं कहते।

रम्या श्रीनिवासन और अज़ीज़ अहमद का एक अलग तर्क है। उनके अनुसार जायसी ने अपने समय की घटनाएं 1303 से मिला दी होंगी: मालवा के सुलतान ग़ियासुद्दीन खिलजी को 1488 में बादल-गोरा नाम के एक सरदार ने हराया था, और पालकी में सैनिक छिपाने की युक्ति शेरशाह द्वारा 1537 में रोहतास किला लेने से मिलती है। किशोरी सरन लाल कालक्रम का भी मुद्दा उठाते हैं: रतनसिंह 1301 में गद्दी पर बैठे और 1303 में हारे, जबकि काव्य में बारह साल की खोज और आठ साल की लड़ाई है।

इतिहासकार तनुजा कोठियाल का नज़रिया यह है कि हर पुनर्कथन अपने समय की चिंताओं को दर्शाता है, और कोई एक संस्करण दूसरे से ज़्यादा सच्चा नहीं। भारतीय विद्या भवन की "हिस्ट्री एंड कल्चर ऑफ द इंडियन पीपल" का आकलन है कि मौजूदा जानकारी के आधार पर इस कथा को निश्चित ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता।

चित्तौड़गढ़ में पद्मिनी महल: क्या देखें और क्या मान्यता है

पद्मिनी महल चित्तौड़गढ़ किले के दक्षिणी हिस्से में कमल-तालाब के किनारे खड़ा सफेद पत्थर का तीन मंज़िला भवन है। तालाब के बीच में एक छोटा जल-मंडप भी है। छतों पर छतरियां हैं और पानी का घेरा इसे जल महल जैसा रूप देता है। सरकारी पर्यटन पोर्टल इंक्रेडिबल इंडिया इसे खिड़कियों और झरोखों वाला महल बताता है, जो बाग और पानी की तरफ़ खुलते हैं।

मौजूदा इमारत 1303 की नहीं है। जानकार स्रोतों के अनुसार इसकी मरम्मत और पुनर्निर्माण बहुत बाद में महाराणा सज्जन सिंह के समय हुआ। इसलिए महल को पद्मिनी के समय की इमारत कहना सही नहीं होगा।

यहां के साथ आईने की कथा जुड़ी है। लोक मान्यता है कि महल की एक कोठरी में लगे दर्पण में अलाउद्दीन ने तालाब की सीढ़ियों पर खड़ी पद्मिनी का प्रतिबिंब देखा था। यह कथा भी बाद की है। 2017 में फ़िल्म "पद्मावती" को लेकर चले विरोध के दौरान ASI ने इस कथा वाली पट्टिका ढक दी, और दर्पण वाला कमरा बंद कर दिया गया। उस समय गाइडों से भी इस प्रसंग को न सुनाने को कहा गया था।

जौहर की जगह के बारे में किले में कोई एक पक्की पहचान नहीं है। लोक मान्यता राणा कुंभा महल के तहखानों की ओर इशारा करती है, जबकि रामवल्लभ सोमानी ने गौमुख कुंड के पास या महलों के भीतर की संभावना जताई थी।

घूमने का टिप चित्तौड़गढ़ का किला करीब 700 एकड़ में फैला है, इसलिए पद्मिनी महल को अकेले नहीं, पास के स्मारकों के साथ एक ही चक्कर में रखें। इंक्रेडिबल इंडिया के अनुसार पास में जयमल-पत्ता का महल, राणा कुंभा महल, पद्मिनी उद्यान, भामाशाह की हवेली और फतेह प्रकाश महल का म्यूज़ियम आते हैं। महल का समय सूर्योदय से सूर्यास्त बताया गया है, पर यात्रा से पहले पुष्टि करें। गाइड से आईने वाली बात पूछें तो याद रखें कि यह लोक मान्यता है, इतिहास में दर्ज घटना नहीं।

जयमल और पत्ता की वीरता 1568 के तीसरे साके से जुड़ी है, जिसे हम अगली पोस्टों में जयमल और फत्ता का इतिहास में पढ़ेंगे। चित्तौड़ किले की पूरी तस्वीर चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास में मिलेगी।

पद्मिनी को लेकर आम गलतफ़हमियां

  • "अलाउद्दीन के दरबारी इतिहासकारों ने पद्मिनी का ज़िक्र किया है।" नहीं। खुसरो, बरनी और इसामी में नाम नहीं मिलता। खुसरो में कुछ विद्वान एक छिपा इशारा पढ़ते हैं, पर इस पर मतभेद है।
  • "पद्मावत इतिहास की किताब है।" जायसी का काव्य सूफ़ी प्रेमाख्यान है, जिसे कई आलोचक रूपक की तरह पढ़ते हैं।
  • "पूरी कथा टॉड की गढ़ी हुई है।" यह भी ठीक नहीं। टॉड से पहले जायसी, हेमरतन और फ़रिश्ता में कथा मौजूद थी।
  • "सारे स्रोत एक ही कहानी कहते हैं।" असल में पद्मिनी कहीं सिंहल की राजकुमारी है, कहीं रतनसेन की बेटी, और टॉड में हमीर संक की कन्या।
  • "महल पद्मिनी के समय का है।" इमारत की मरम्मत और पुनर्निर्माण बहुत बाद का है।

परीक्षा के लिए रानी पद्मिनी से जुड़े तथ्य

  • चित्तौड़ पर अलाउद्दीन खिलजी का घेरा: 28 जनवरी 1303 से 26 अगस्त 1303।
  • रतनसिंह (रत्नसेन) 1301 के आसपास चित्तौड़ की गद्दी पर बैठे।
  • "पद्मावत" के रचयिता मलिक मुहम्मद जायसी, रचनाकाल 1540, भाषा अवधी।
  • हेमरतन की "गोरा बादल पद्मिनी चौपाई" करीब 1589 की रचना।
  • टॉड के अनुसार पद्मिनी हमीर संक चौहान की पुत्री और भीमसी की पत्नी थीं।
  • अमीर खुसरो की रचनाओं में पद्मिनी का नाम नहीं मिलता।
  • कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1460) घेरे का सबसे पुराना हिंदू अभिलेख।
  • चित्तौड़गढ़ किला 2013 में UNESCO की "हिल फोर्ट्स ऑफ राजस्थान" सूची में शामिल।

रानी पद्मिनी से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

रानी पद्मिनी कौन थीं?

कथाओं में वे चित्तौड़ के राजा रतनसिंह की रानी और अपूर्व सुंदरी बताई जाती हैं, जिनके लिए अलाउद्दीन खिलजी के हमले की कथा प्रचलित है। 1303 के घेरे की समकालीन रचनाओं में उनका नाम नहीं मिलता।

रानी पद्मिनी का जौहर कब हुआ?

कथा के अनुसार चित्तौड़ के पतन पर, यानी अगस्त 1303 में। पर इतिहासकार इस पर एकमत नहीं हैं कि 1303 में जौहर हुआ भी था या नहीं।

क्या रानी पद्मिनी सच में थीं?

पक्के प्रमाण नहीं हैं। कुछ विद्वान कथा का एक हिस्सा ऐतिहासिक मानते हैं और कुछ इसे जायसी की रचना। 1303 के घेरे और रतनसिंह की ऐतिहासिकता पर विवाद नहीं है।

पद्मावत किसने और कब लिखा?

सूफ़ी कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने, लगभग 1540 में, अवधी भाषा में। इसे प्रेम की कथा के रूप में आध्यात्मिक रूपक भी माना जाता है।

अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर कब हमला किया?

घेरा 28 जनवरी 1303 को शुरू हुआ और 26 अगस्त 1303 को किला उसके कब्ज़े में आया।

पद्मिनी महल कहां है?

चित्तौड़गढ़ के किले के भीतर, दक्षिणी हिस्से में एक कमल-तालाब के किनारे। इसकी मौजूदा इमारत बाद के समय की मरम्मत वाली है।

पद्मिनी के पिता कौन थे?

स्रोत अलग-अलग हैं। जायसी में वे सिंहल के गंधर्वसेन की बेटी हैं, टॉड में सिंहल के चौहान राजा हमीर संक की, और फ़रिश्ता में रतनसेन की बेटी।

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रानी पद्मिनी का इतिहास पढ़ते समय सबसे काम की आदत यह है कि हर बात के साथ उसका स्रोत और तारीख देखें। 1303 के घेरे के बारे में खुसरो की गवाही है, पद्मिनी की कथा के लिए जायसी, हेमरतन और टॉड हैं, और दोनों को एक साथ मिला देना ही गलतफ़हमी की जड़ है। चित्तौड़गढ़ से जुड़ी बाकी पोस्ट इस ज़िले के लेबल पेज पर मिल जाएंगी, और अगली पोस्ट में गोरा और बादल की कथा है।

स्रोत: UNESCO, Hill Forts of Rajasthan; इंक्रेडिबल इंडिया, रानी पद्मिनी महल; जेम्स टॉड, Annals and Antiquities of Rajast'han; INFLIBNET, पद्मावत: ऐतिहासिकता और महाकाव्यत्व; Scroll; The Quint; The Daily Star; eSamskriti।

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