कोटा दशहरा मेला 2026 इस बार 11 अक्टूबर (नवरात्र के पहले दिन) से 5 नवंबर तक कोटा के दशहरा मैदान में लग रहा है, और रावण दहन विजयादशमी यानी मंगलवार, 20 अक्टूबर की शाम होगा। यह 133वां राष्ट्रीय दशहरा मेला है, जिसे कोटा नगर निगम आयोजित करता है। इस उत्सव की जड़ें 1723 ई. तक जाती हैं, जब कोटा की गद्दी पर महाराव दुर्जनशाल सिंह हाड़ा बैठे थे।
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चंबल किनारे बसे कोटा में दशहरा सिर्फ एक शाम का त्योहार नहीं है। यहां पूरा शहर करीब चार हफ्ते तक मेले के रंग में रहता है: एक तरफ गढ़ पैलेस से निकलने वाली भगवान लक्ष्मीनारायण जी की शाही सवारी, दूसरी तरफ रात-रात भर चलने वाले कवि सम्मेलन, कुश्ती दंगल और झूले। नीचे इस मेले की 2026 की तारीखें, करीब 300 साल पुराना इतिहास, इसकी अनोखी रस्में और घूमने की ज़रूरी जानकारी एक जगह दी गई है।
कोटा दशहरा मेला: एक नज़र में
| नाम | राष्ट्रीय दशहरा मेला, कोटा |
| 2026 का संस्करण | 133वां |
| मेले की तारीख (2026) | 11 अक्टूबर से 5 नवंबर 2026 (करीब 26 दिन) |
| रावण दहन (2026) | मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 (विजयादशमी) |
| स्थान | दशहरा मैदान, कोटा शहर |
| ज़िला / क्षेत्र | कोटा, हाड़ौती क्षेत्र |
| आयोजक | नगर निगम, कोटा |
| परंपरा की शुरुआत | 1723 ई., महाराव दुर्जनशाल सिंह हाड़ा का शासनकाल |
| मेले को बड़ा रूप देने वाले शासक | महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय (शासन 1889–1940) |
| मुख्य मंच | श्रीराम रंगमंच और विजयश्री रंगमंच |
| खास रस्म | गढ़ पैलेस से भगवान लक्ष्मीनारायण जी की सवारी |
कोटा दशहरा मेला 2026 कब है? तारीख और मुख्य कार्यक्रम
2026 में मेला 11 अक्टूबर को शुरू होकर 5 नवंबर को आतिशबाजी के साथ खत्म होगा। नवरात्र 11 से 19 अक्टूबर तक हैं, इसलिए शुरुआती नौ दिन रामलीला और पूजा-पाठ के रहते हैं। असली रौनक 20 अक्टूबर, दशहरे की शाम से शुरू होती है।
नगर निगम की ओर से जारी कार्यक्रम के मुख्य दिन ये हैं (यात्रा से पहले पुष्टि करें):
| तारीख | कार्यक्रम |
|---|---|
| 11 अक्टूबर (रविवार) | सुबह आशापुरा माता मंदिर में दुर्गा पूजा, शाम को श्रीराम रंगमंच पर ध्वजारोहण के साथ मेले का शुभारंभ, रात से रामलीला |
| 15 अक्टूबर (गुरुवार) | गीता भवन से श्रीराम रंगमंच तक राम बारात |
| 20 अक्टूबर (मंगलवार) | शाम को गढ़ पैलेस से भगवान लक्ष्मीनारायण जी की सवारी, दशहरा मैदान पहुंचने के बाद रावण दहन और आतिशबाजी |
| 21 अक्टूबर (बुधवार) | किशोरपुरा से भरत मिलाप की शोभायात्रा, श्रीराम का राज्याभिषेक |
| 22 अक्टूबर से 4 नवंबर | विजयश्री रंगमंच पर हर शाम सांस्कृतिक कार्यक्रम |
| 1 और 2 नवंबर | श्रीराम रंगमंच पर कुश्ती दंगल |
| 5 नवंबर (गुरुवार) | आतिशबाजी के साथ मेले का समापन |
पिछले साल यानी 2025 में 132वां मेला 22 सितंबर से 17 अक्टूबर तक चला था और रावण दहन 2 अक्टूबर को हुआ था। हर साल तारीख नवरात्र और दशहरे के हिसाब से बदलती है, इसलिए अगले साल की योजना बनाते समय नई तारीख ज़रूर देखें।
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कोटा दशहरा मेले का इतिहास: 1723 से 133वें मेले तक
कोटा दशहरा मेले का इतिहास हाड़ा चौहान शासकों से जुड़ा है, जिनके नाम पर यह पूरा इलाका हाड़ौती कहलाता है। पर्यटन विभाग और भारत सरकार के उत्सव पोर्टल, दोनों के विवरण के अनुसार कोटा में दशहरे का यह उत्सव 1723 ई. में महाराव दुर्जनशाल सिंह हाड़ा के समय शुरू हुआ। दुर्जनशाल सिंह 1723 से 1756 तक कोटा के शासक रहे।
राजदरबार का उत्सव
शुरुआत में यह आम लोगों का मेला कम और राजदरबार का उत्सव ज़्यादा था। मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान होते, राजा की सवारी निकलती और महल में "दरीखाना" सजता। दरीखाना यानी वह शाही बैठक, जिसमें रियासत के ठिकानेदार (जागीरदार) राजा के सामने हाज़िर होकर दशहरे की बधाई देते थे।
उम्मेद सिंह द्वितीय और मेले का बड़ा रूप
मेले को आज जैसा बड़ा और रंगीन रूप महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय (शासन 1889–1940) के समय मिला। 2026 के 133वें मेले से गिनती पीछे की ओर गिनें तो वह भी उन्हीं के शासन वाले 19वीं सदी के आखिरी दशक में पहुंचती है। यानी मेले की गिनती बाद में शुरू हुई, जबकि दशहरे की शाही परंपरा उससे करीब डेढ़ सदी पुरानी है।
पुराने समय में मेले में दुकानदारों से कर नहीं लिया जाता था, इसलिए सामान सस्ता मिलता और दूर-दूर के गांवों से लोग खरीदारी करने आते। आसपास के किसान यहां पशुओं की खरीद-बिक्री के लिए भी पहुंचते थे।
रियासत से नगर निगम तक
आज़ादी के बाद रियासत खत्म हुई, पर मेला रुका नहीं। आज इसका पूरा आयोजन कोटा नगर निगम करता है, और पर्यटन विभाग इसमें लोक कलाओं के कार्यक्रम जोड़ता है। अखिल भारतीय कवि सम्मेलन और मुशायरा दशकों से मेले की पहचान रहे हैं।
कुछ बातें जो अक्सर गलत बताई जाती हैं
- "मेला राव माधो सिंह ने 1892 में शुरू किया": कुछ वेबसाइटों पर यह दावा मिलता है, लेकिन राव माधो सिंह कोटा के पहले स्वतंत्र शासक थे और उनका शासन 1631 से 1648 तक रहा। 1892 के आसपास कोटा पर महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय का शासन था।
- "मेला 400 साल पुराना है": उपलब्ध सरकारी विवरण शुरुआत 1723 ई. बताते हैं, यानी 2026 तक करीब 300 साल। मेले की गिनती (133वां) इससे अलग है, क्योंकि वह आम जनता के मेले के रूप में बाद में गिनी जाने लगी।
- महाराव भीम सिंह द्वितीय और उम्मेद सिंह द्वितीय: कुछ लेखों में दोनों के नाम आपस में मिल जाते हैं। उम्मेद सिंह द्वितीय 1889 से 1940 तक और भीम सिंह द्वितीय 1940 से शासक रहे।
कोटा दशहरे की परंपराएं और रस्में
कोटा का दशहरा बाकी शहरों से इसलिए अलग है, क्योंकि यहां रावण दहन से पहले पूरी शाही रस्में आज भी निभाई जाती हैं।
गढ़ पैलेस का दरीखाना और लक्ष्मीनारायण जी की सवारी
दशहरे के दिन गढ़ पैलेस (कोटा का पुराना राजमहल) में दरीखाना सजता है, जहां पूर्व राजपरिवार के सदस्य पारंपरिक पोशाक में लोगों से दशहरे की बधाई लेते हैं। इसके बाद भगवान लक्ष्मीनारायण जी की पूजा होती है।
फिर शाम को भगवान लक्ष्मीनारायण जी की सवारी गढ़ से निकलती है और किशोरपुरा दरवाज़े से होते हुए दशहरा मैदान पहुंचती है। सवारी के साथ बैंड, हाड़ौती के लोक कलाकार, हाथी-घोड़े और झांकियां चलती हैं। पूर्व राजपरिवार के सदस्य भी इसी सवारी के साथ मैदान तक आते हैं।
तीर से शुरू होता है रावण वध
मैदान पहुंचकर पूजा के बाद पूर्व राजपरिवार के सदस्य रावण के पुतले पर तीर चलाते हैं, और इसी के बाद पुतलों में आग लगाई जाती है। 2017 के मेले की रिपोर्ट के मुताबिक तीर से रावण की नाभि पर लगे कलश को भेदा गया था। पहले कुंभकर्ण, फिर मेघनाद और आखिर में रावण का पुतला जलता है, जिसके बाद आसमान आतिशबाजी से भर जाता है।
"रावणजी" और तोपों की गूंज
इतिहासकार फ़िरोज़ अहमद के हवाले से राजस्थान पत्रिका में छपे लेखों में कोटा दशहरे की कुछ पुरानी परंपराएं दर्ज हैं। पहले यहां रावण को जलाने की जगह उसका "वध" किया जाता था, और विद्वान होने के कारण उसे सम्मान से "रावणजी" कहा जाता था। युद्ध से पहले एक दूत रावण को आत्मसमर्पण का संदेश देने जाता, फिर तोपें दागकर युद्ध का ऐलान होता।
दशहरा मैदान में रावण, मेघनाद, कुंभकर्ण, मंदोदरी और खर-दूषण के पक्के पुतले खड़े रहते थे। पहले दिन रावण का चेहरा लाल रंगा जाता और लोग उस पर कंकड़ मारते, इस मान्यता के साथ कि इससे संकट दूर होते हैं। बाद में बाकी पुतले हटा दिए गए। तोपों की सलामी 1963 तक मेले का बड़ा आकर्षण रही। उस समय की तोपों के नाम भी लोगों को याद हैं, जैसे नौ दुर्गा, नारायण बाण और नगीना।
कोटा के रावण के पुतले: 72 फीट से 200 फीट तक
कोटा के पुतले हमेशा से ऊंचाई के लिए चर्चा में रहे हैं। 2008 और 2017 की रिपोर्टों में रावण का पुतला करीब 72 फीट का बताया गया, जबकि 2017 में कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले 45-45 फीट के थे।
हाल के सालों में यह होड़ और बढ़ी। 2025 के 132वें मेले में विश्व रिकॉर्ड के इरादे से 200 फीट से ऊंचा रावण तैयार किया गया था। पुतलों के भीतर पटाखे भरे जाते हैं, और रावण का सिर घुमाने, तलवार चलाने और पलकें झपकाने जैसी हरकतें भी इनमें जोड़ी जाती हैं।
मेले में क्या देखें और क्या खाएं
दशहरे के बाद मेला अपने पूरे रंग में आता है। मैदान में दो बड़े मंच हैं: श्रीराम रंगमंच पर रामलीला, राम बारात से जुड़े आयोजन और कुश्ती दंगल होते हैं, जबकि विजयश्री रंगमंच पर हर शाम कोई न कोई बड़ा कार्यक्रम रहता है।
2026 के कार्यक्रम में ये चीज़ें खास हैं:
- अखिल भारतीय कवि सम्मेलन और राजस्थानी भाषा का कवि सम्मेलन
- सिंधी समाज का कार्यक्रम, पंजाबी नाइट, भोजपुरी कार्यक्रम और सिने संध्या
- "एक शाम शहीदों के नाम", भजन संध्या और लाफ्टर शो
- मलखंब, साफा-पगड़ी बांधने, रंगोली-मांडणा-मेहंदी और दाढ़ी-मूंछ प्रतियोगिताएं
- लेज़र शो, ड्रोन शो और गतका (सिख युद्ध कला) का प्रदर्शन
- बच्चों की प्रतिभा के कार्यक्रम और कॉस्ट्यूम फेस्टिवल
मांडणा राजस्थान की वह लोक कला है, जिसमें घर के आंगन और दीवारों पर खड़िया और गेरू से आकृतियां बनाई जाती हैं।
खाने में कोटा की पहचान कचौरी है, जो मेले की दुकानों पर भी खूब मिलती है। इसके अलावा झूले, खिलौने, घर का सामान और हस्तशिल्प की सैकड़ों दुकानें मेले को बाज़ार जैसा रूप दे देती हैं।
कोटा दशहरा मेला कैसे पहुंचें: घूमने की जानकारी
रेल से: कोटा जंक्शन दिल्ली-मुंबई मुख्य रेल लाइन पर है, इसलिए देश के ज़्यादातर बड़े शहरों से सीधी ट्रेन मिल जाती है। स्टेशन से दशहरा मैदान तक ऑटो और टैक्सी आसानी से मिलते हैं।
सड़क से: जयपुर से कोटा करीब 250 किमी है। जयपुर, अजमेर, उदयपुर और मध्य प्रदेश के शहरों से राजस्थान रोडवेज़ और निजी बसें चलती हैं।
हवाई जहाज़ से: कोटा में फिलहाल नियमित उड़ानें नहीं हैं। सबसे पास का बड़ा एयरपोर्ट जयपुर है। कोटा-बूंदी के बीच शंभूपुरा में नया ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट बन रहा है, जहां से दिसंबर 2027 तक उड़ानें शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है।
कब जाएं: शाही सवारी और रावण दहन देखना हो तो 20 अक्टूबर की शाम सबसे अहम है। भीड़ से बचकर आराम से मेला घूमना हो तो दशहरे के बाद किसी कामकाजी दिन शाम को जाएं, जब मंच पर कार्यक्रम चल रहे हों।
मेला घूमने का टिप दशहरे की शाम सवारी देखने के लिए गढ़ पैलेस से किशोरपुरा वाले रास्ते पर पहले से जगह ले लें, फिर उसी के पीछे-पीछे मैदान की ओर चलें। अगर आप कोटा में दो दिन रुक रहे हैं, तो अगले दिन यानी 21 अक्टूबर को भरत मिलाप की शोभायात्रा भी देख सकते हैं।
- रावण दहन वाली शाम निजी गाड़ी मैदान के पास तक ले जाने की कोशिश न करें, उस दिन रास्ते बदले जाते हैं और भीड़ बहुत होती है।
- दहन के समय पुतलों के बहुत पास न जाएं, उनमें भरे पटाखे दूर तक चिंगारी फेंकते हैं।
- बच्चों को भीड़ में अकेला न छोड़ें; मैदान में घुसते ही मिलने की एक जगह तय कर लें।
परीक्षा के लिए कोटा दशहरा मेले से जुड़े तथ्य
- कोटा में दशहरा उत्सव की परंपरा 1723 ई. में महाराव दुर्जनशाल सिंह हाड़ा के शासनकाल से मानी जाती है।
- मेले को भव्य रूप महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय (1889–1940) के समय मिला।
- 2026 में 133वां राष्ट्रीय दशहरा मेला आयोजित हो रहा है; 2025 में 132वां था।
- आयोजक: कोटा नगर निगम। स्थान: दशहरा मैदान, कोटा।
- मेले के दो मुख्य मंच: श्रीराम रंगमंच और विजयश्री रंगमंच।
- दशहरे पर भगवान लक्ष्मीनारायण जी की सवारी गढ़ पैलेस से निकलती है।
- दरीखाना: राजमहल में होने वाली शाही बैठक, जिसमें ठिकानेदार राजा को दशहरे की बधाई देते थे।
- कोटा दशहरे पर तोपों की सलामी 1963 तक दी जाती रही।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कोटा दशहरा मेला 2026 कब से कब तक है?
2026 में कोटा का दशहरा मेला 11 अक्टूबर से 5 नवंबर तक दशहरा मैदान में लगेगा। यह करीब 26 दिन चलेगा।
कोटा में रावण दहन 2026 कब होगा?
रावण दहन विजयादशमी, मंगलवार 20 अक्टूबर 2026 की शाम होगा। गढ़ पैलेस से लक्ष्मीनारायण जी की सवारी मैदान पहुंचने के बाद पुतले जलाए जाते हैं।
कोटा दशहरा मेला किसने शुरू किया?
सरकारी विवरणों के अनुसार कोटा में दशहरा उत्सव 1723 ई. में महाराव दुर्जनशाल सिंह हाड़ा के समय शुरू हुआ। मेले को बड़ा रूप महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय के शासन (1889–1940) में मिला।
2026 में कोटा का कौन सा दशहरा मेला है?
2026 में 133वां राष्ट्रीय दशहरा मेला लग रहा है। 2025 में 132वां मेला हुआ था।
कोटा दशहरा मेला कौन आयोजित करता है?
मेले का आयोजन कोटा नगर निगम करता है। पर्यटन विभाग इसमें लोक कला के कार्यक्रम जोड़ता है।
कोटा के रावण के पुतले की ऊंचाई कितनी होती है?
ऊंचाई हर साल बदलती है। 2017 में रावण करीब 72 फीट का था, जबकि 2025 में 200 फीट से ऊंचा पुतला बनाया गया था।
कोटा दशहरा मेले में कैसे पहुंचें?
सबसे आसान रास्ता ट्रेन है, क्योंकि कोटा जंक्शन दिल्ली-मुंबई मुख्य लाइन पर है। कोटा में अभी नियमित फ्लाइट नहीं हैं, सबसे पास का बड़ा एयरपोर्ट जयपुर है।
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अगर आप इस बार कोटा दशहरा मेला देखने जा रहे हैं, तो 20 अक्टूबर की शाम गढ़ पैलेस से निकलने वाली सवारी ज़रूर देखें, यही वह हिस्सा है जो करीब 300 साल पुरानी परंपरा को आज भी ज़िंदा रखे हुए है। और लौटते हुए कोटा की कचौरी चखना न भूलें।
स्रोत: Utsav Portal, भारत सरकार (National Dassehra Fair, Kota); Incredible India, पर्यटन मंत्रालय; ETV Bharat (133वें मेले का कार्यक्रम, अक्टूबर 2026); दैनिक नवज्योति; राजस्थान पत्रिका (2017, 2018, 2019, 2025 की रिपोर्टें); The Tribune (2008); Kota State, शासकों की सूची





